Saturday, February 26, 2011

राजस्थान में भाजपा का चेहरा वसुन्धरा


वसुन्धरा राजे ने करीब सवा साल बाद एक बार फिर से औपचारिक तौर पर राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की कमान संभाल ली है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब उन्हें बनाना था, तो उनसे इस्तीफा लिया ही क्यों गया था। दरअसल इसे समझने के लिए हमें जरा बड़े परिदृश्य पर और थोड़ा फ्लैश बैक में जाना होगा। भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में पिछले कुछ सालों से एक अजीब सी उथल पुथल मची हुई है। एकचालकानुवर्तति की धारणा पर चलने वाले संगठन के मार्गदर्शन में पल्लवित पुष्पित हुई इस पार्टी में ही एकचालकानुवर्तति की धारणा के पालन का संकट खड़ा हो गया था । जब तक पार्टी में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज सक्रिय थे उनका कहा पार्टी में अन्तिम हुआ करता था और अन्य सभी चाहे राजी से या चाहे बेराजी से उन्हीं की बात का अनुसरण करते नजर आते थे। लेकिन उनकी सक्रियता कम होने के साथ ही पार्टी के शीर्ष पर सर्वमान्य नेता की कमी हो गई, और लगभग समान रूप से वरिष्ठों की टोलियों ने अपनी ढपली अपने राग छेड़ने शुरू कर दिए। नेताओं में अहम की लड़ाई उग्रतम रूप में सामने आई, और नतीजे में पार्टी को अपने कई नेता खोने पड़ गए और इस प्रक्रिया में कभी उन नेताओं का अहम् कारण बना तो कहीं शीर्ष पदों पर बैठे लोगों ने अपने अहम के खातिर उनकी बलि ली। इसी दौर में पार्टी ने गोविन्दाचार्य, उमा भारती, जसवंत सिंह जैसे नेता खो दिए तो कई नेता हाशिए पर हो गए। देश प्रदेश की ईकाइयों में आपसी खींचतान ने व्यापक रूप ले लिया क्योंकि कोई ऐसी आवाज नहीं थी तो अति करने वालों को डपट सकती। बहरहाल बहुत दुर्गति के बाद पार्टी में इस बवंडर को थामने की कोशिश हुई और शीर्ष नेतृत्व में बदलाव हुआ। चमत्कार को नमस्कार करने वाली भारतीय जनता को अपनी आदत के अनुसार चमत्कारी परिवर्तन की आस थी, लेकिन ऐसा न होना था न हुआ। और लोग अपने तईं नए नेतृत्व को भी चुका हुआ मान बैठे। लेकिन कहीं कुछ बहुत आहिस्ता आहिस्ता बदल रहा है, और उसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि आलाकमान यह समझने लगा है कि भारतीय राजनीति विचारधारा की नहीं बल्कि व्यक्तित्वों की राजनीति है। ऐसे में जो व्यक्तित्व जनमानस में अपना असर छोड़ते हैं उन्हें साथ लेकर चलने से ही पार्टी खोई रंगत पा सकेगी। कांग्रेस की तरह किसी एक व्यक्ति के पूरे देश में एक समान असर वाले व्यक्तित्व के अभाव में भाजपा को सफल होने के लिए बहुत से व्यक्तित्वों का सफल समीकरण बनाना होगा। और इस सबमें सबसे अहम यह है कि एक प्रभावी और डपट भरी आवाज का पार्टी में अभी अभाव सा ही है। हां एक ऐसी समझ जरूर दिखने लगी है जो गाहे बगाहे सबका समन्वय करती नजर आती है। जसवंत सिंह की पार्टी में वापसी हो या उमा भारती को लेकर बनती अनुकूलता, सब पार्टी के दीर्घावधि फायदे की बात लगते हैं। राजस्थान में वसुन्धरा राजे की वापसी भी इसी कड़ी में एक कदम नजर आता है। प्रदेश भाजपा में यह सर्वविदित है कि यदि कोई पूरे प्रदेश में जननेता है तो वह वसुन्धरा राजे ही है। ऐसे में प्रदेश में पार्टी को उनकी हर हाल में सक्रिय जरूरत है। उनकी निष्क्रियता या पार्टी गतिविधियों से अलग हैं रहने का असर पार्टी की छवि और प्रभाव में साफ नजर आने लगा था, हालांकि संगठन का अपना प्रभाव होने से पार्टी की गतिविधियां सुचारू चलती दिख रही थीं पर पार्टी के कार्यक्रमों की धार गायब थी। मंडल स्तर तक पार्टी संगठनवादियों और वसुंधरा समर्थकों में बटी नजर आ रही थी। ऐसे में किसी भी प्रकार इस अंतर को समाप्त करने, कम से कम ऊपरी तौर पर तो, का प्रयास जरूरी था। हालांकि संगठन के कई लोगों को यह निर्णय रास नहीं आ रहा है क्योंकि अहम की इस लड़ाई में एक पक्ष की हार और एक पक्ष की जीत साफ नजर आ रही है जो कि गुटीय संघर्षों के समझौतों की सामान्य अवधारणा, तेरी भी जय जय मेरी भी जय-जय, के पूरी तरह खिलाफ है। पर यह देखने वाली बात होगी कि क्या वाकई आलाकमान की यह पॉलिटिकल इंजीनियरिंग कुछ जोरदार गुल खिलाएगी। अंजाम भले ही जो लेकिन अब एक बात तय है कि राजस्थान की राजनीति में भाजपा का एकमात्र चेहरा वसुन्धरा राजे ही है। कांग्रेस और भाजपा के बीच तेज होती जंग और आरोपों की तीखी धार के बीच रोज नई-नई खबरें सुर्खियां बनेंगी।

No comments: