Monday, September 13, 2010

हिन्दी का मौसमी बुखार,hindi divas

कल हिन्दी दिवस है और हम हिन्दी के सिपाही बनने के लिए बेचैन हो रहे हैं। पर पता नहीं क्यों मुझे लग रहा है जैसे हमें कोई श्मशानिया बैराग जागने लगा हो। मन बहुत बेचैन होने लगा है। कुछ समझ नहीं आ रहा है क्या किया जाए। चलो चचा हंगामी लाल से ही कुछ पूछा जाए। थोड़ी खोज खबर करने पर चचा मिल ही गए।
हमने कहा चचा आज मन कुछ बेचैन हो रहा है।
बोले क्यों लाला क्या बात हो गई।
हमने अपनी व्यथा कथा उन्हें सुनाई। बिना पूरी बात सुने ही उन्होंने कहा,, अरे ऐसी कोई बात नहीं है तुम ज्यादा फसट्रेट मत होओ,, ये टाइमिंग की बात है, ऑटोमेटिकली ठीक हो जाएगी।
उनके इस एक वाक्य में तीन तीन अंग्रेजी के शब्द सुनते ही हमारा सोया हिन्दी प्रेम यकायक जाग उठा। सत्यानाश हो चचा, तुम्ही जैंसे लोगों ने हिन्दी का बेड़ा गर्क किया है।
क्यों भाई मैंने क्या कर दिया।
अरे अभी देखो आपने ही तो इतनी अंग्रेजी झाड़ दी। क्या आप फस्ट्रेट की जगह तनाव और टाइमिंग की जगह समय -समय तथा ऑटोमेटिकली की जगह अपनेआप का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे।
अरे ऐसा क्या,, सॉरी भाई सॉरी अब से ध्यान रखूंगा।
फिर सॉरी,, अंग्रेज चले गए इन्हें छोड़ गए।
अरे गलती हो गई भतीजे, काहे गरम होते हो,, अबकी बार अगर अंग्रेजी का एक शब्द भी बोला तो तुम जो चाहो कर लेना, प्लीज भतीजे मान जाओ।

इतना सुनते ही अपने राम ने कुछ और कहने की बजाय आगे बढ़ना ही उचित समझा,, और साथ ही यह भी समझ आ गया कि हमारा सोचना ठीक ही है,, हमें ये मौसमी बुखार ही हुआ लगता है,, अब तो मौसम के गुजरने के बाद ही पता चलेगा की बुखार आगे भी बरकरार रहता है या नहीं। ,,,, आप सब गवाह हैं,,,। याद रखिएगा

3 comments:

रंजन said...

फोटोग्राफी के मेरे कोच "रायन लिब्रे" ने कहा.. हिंदी बोलते हुए ही लोग अंग्रेजी वाक्यों का प्रयोग करते है... ऐसा केवल उसने हिंदी में ही देखा है.. जापानी या थाई या चीनी.. अपनी भाषा बेलते हुए अंग्रेजी नहीं बोलते...

मैंने कहा क्या करे हिंदी है ही इतनी "इन्क्लूसिव"

abhishek said...

हा हा हा,, आप सही कह रहे हैं,, रंजन जी,,

काशीराम चौधरी said...

sir aapse achcha gajab ka hindi prem kaun dikha sakta hai.