Thursday, October 1, 2009

गांव की सड़क ऐसी क्यों नहीं,,,,

आजादी के बासठ साल बीत गए हैं, और लोगों को अभी भी हालात में कोई अन्तर नहीं लगता। यहां कोटा में आसपास के किसान बिजली की मांग को लेकर एक महापंचायत में शामिल होने आए थे। बात भले ही राजनैतिक थी, लेकिन दर्द राजनीति से परे था। रैली में आए करीब सात आठ हजार किसानों में आक्रोश कूट कूट कर भरा था। उनमें हर उम्र के किसान थे। सबका एक ही स्वर था, ये जो महल यहां बने हैं, जो लाइट के खम्भे यहां लगे हैं, ये बढ़िया सड़क यहां बनी है,, वो हमारे गांव में क्यों नहीं है,, वोट तो हम भी उतना ही देते हैं, जितना ये शहर वाले देते हैं। एक लम्बी दाढ़ी वाले बुजुर्ग करीब ७५ से ज्यादा उम्र के थे,, ( अपनी उम्र के बारे में उनका कहना है कि अंग्रेज गया नीं, जद मूं पूरो मोट्यार छो। ) कहते हैं कि उनके पिता और घर में सबका अन्त तक यही कहना था कि अंग्रेज बहादुर और राज के टाइम में और अब के टाइम में कोई फर्क नी है। टैम वा ई है। कुछ ई कौने बदल्यो। जब मैंने कहा अरे अब तो सबकुछ बदल गया है, आप खुद वोट देकर अपने लोग चुनते हो, वो ही सारी चीजें तय करते हैं, बुजुर्ग एकदम तल्ख अंदाज में कहता है,, कांई बदल्यो बताओ,, और इतना कहते हुए उसने अपना एक और से फटा कुर्ता आगे कर दिया। यो सिलवा खातिर अंजाम कोनी। है कोई जो कैवे के बाबा काल री चिंता मत कर मूं अनाज देवूंला। कोई न देवें। गाम में पटवारी बिंघोटी अर खाता में जो नाप करे वो तो वोई जाणै।,, पंचायत में आने का सबब पूछने पर हरजी कहता है,, देखो ,, नेता जी आया छा बी न कही कि सरकार कुछ तो सुणैगी, सब बात करांगा तो कुछ तो होगो। जी खातिर आया छा। पण मन तो नी लागे सरकार काई सुणैगी। पैली राज के टाइम में पतो तो रहतो छौ की सरकार कुण छे। अब तो पतो ई कौन लागे की सरकार कुण छै, और वो किण तरया सु सुणैली। कोई राज आ जाओ, गांव वाला की तो कोई न सुणे। ,,,
हरजी की इन बातों मे क्या छुपा है, आप खुद अंदाजा लगा लें, सारी बात यूं की यूं आपके लिए पेश है,,

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

हिन्दी ब्लागिंग में आप का स्वागत है। कल मैं वहीं था। महापंचायत केवल एक संख्याबल की राजनीति थी। लगता था किसान जुझेंगे। लेकिन महापंचायत सात घंटे में समाप्त हो गई। उन्हें लाने लेजाने वाली बसें इतने ही समय के लिए बुक्ड थीं। अच्छीबात हुई तो बस इतनी कि किसानों ने इस राजनीति का एक अनुभव और कर लिया जो उस दिन काम आएगा जिस दिन वे जाग उठेंगे।

abhishek said...

dinesh ji aapke swagat ke liye dhnyawad,, hindi bloging mian teen saal gujarane ke baad swagat hona achchi anubhuti de raha hai...
hha dharna jaroor rajnitik tha,, lekin jo likha wo peeda apni jagah hain . apki pratikriya ke liye dhanyawad..