Monday, April 6, 2009

वो बे-कार और हम बदहाल

अरे कहां हो बरखुर्दार, तुम लोग क्या-क्या छाप देते हो...!

आवाज सुनते ही हमें यकीन हो गया कि हो न हो चचा हंगामी लाल आज कुछ झुंझलाए हुए हैं और पूरा मीडिया पुराण हम पर ही उतारने वाले हैं, पर वो किस खबर को लेकर लाल-पीले हो रहे थे, इस उत्सुकता से भरे हम उनकी और देखने लगे।

अब देखो.. तुमने छापा,, राहुल बे-कार,,, । अरे भाई लाखों दिलों पर राज करने वाला बेकार कैसे हो सकता है। वो तो निहायत ही काम का आदमी है बेकार होओगे तुम लोग जो उसे एक कार नहीं होने पर ही बे-कार करार दे रहे हो। अरे अभी तो उसकी परख भी नहीं हुई है। पहले जांचों परखो फिर कहो..।

अरे चचा काहे परेशान हो रहे हो वो तो जरा ऐसे ही तुकबंदी मिलाने के लिए लिख दिए थे पर आप परेशान क्यों हो रहे हो। वो बे-कार . कारदार हो आपको क्या,,,।

अरे वाह, मुझे कुछ कैसे नहीं। अब तुम मीडिया वाले तो चटखारे तलाशते हो, राहुल के पास यूं तो करोड़ों रुपए की सम्पति है पर तुम्हें उसका बेकार होना ही खबरगार लगा। वो एक और करोड़पति है जिसके पास कोई पुरानी खटारा है जिसे तुमने जम कर छापा साढ़े सात हजार की फिएट पद्ममिनी कार। तुमको तो कुछ चटखारा चाहिए, सो ठीक है पर हमें फिक्र अपनी है.. हमारी पोल खुलेगी तब तो तुम लोग हमारी तो कुछ भी इज्जत नहीं रखोगे। हमें एक लाइन भी नहीं दोगे।

देंगे कैसे नहीं, चचा तुम्हें भी पार्टी का टिकट मिला है। तुम शपथ पत्र भरो हम लिखेंगे, हंगामी के पास सवा सौ की साइकिल।,,

यही तो अफसोस है, तुम यह नहीं लिख सकते,... क्योंकि यह साइकिल तो हमारे पिता जी की है.. जो अभी गांव में हैं। इस हिसाब से यह उनकी सम्पति हुई।

ओ.. , चलो कोई बात नहीं तुम कुछ तो भरो हम उसी हिसाब से कुछ न कुछ जुगाड़ लगाएंगे और तुम्हें भी खबर लायक बनाएंगे।

अरे नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या, अब देखो हमारा घर, जिस में हम रहते हैं, वो हमारा नहीं है, किराए का है,. पिता जी ने किराए पर लिया..रिटायर हो कर वो तो गांव चले गए और हम यहीं रहते रह गए। पता नहीं किसका है, लेकिन हम रहते हैं तो हमारा ही है,, पर तुम तो जानते हो कि इसका जिक्र तो हम संपत्ति में नहीं कर सकते हैं न...भले ही यह शहर के बीचोंबीच है,., कोई बता रहा था, करोड़ों का है..। रही बात टीवी, कम्प्यूटर, सोफे और भी न जाने क्या क्या की तो वो सब हमारी धर्मपत्नी लाईं थीं। सो वो भी उनका है।

चचा कोई बात नहीं बैंक में एफ डी वगैराह तो होगी..

हां, है तो सही पर इनकम टैक्स वालों के चक्कर में सब रामलाल के नाम पर करवा रखी हैं।

ये रामलाल कौन है,., पहले कभी नाम नहीं सुना।

गांव में हमारे यहां खेत पर काम करता है। वो तो उसके नाम से मैं ही अंगूठा लगा देता हूं। उसे क्या पता।

अरे चचा तुम्हारे नाम जो खाता है.. जिसमें तुम्हारी तनख्वाह आती है.,वो तो होगा ,. उसमें कितने पैसे हैं,.,.

उसमें 323 रुपए हैं।

वाह चचा बस बन गया काम.,., तुम फिकर मत करो तुम्हारी वह झांकी जमेगी की दुनिया देखेगी...

हैडिंग होगा..

बदहाल हंगामीलाल के पास 323 रुपए

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3 comments:

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

हा हा हा.. वाह जी वाह.. क्या खूब लिखा है.. अगले लेख का इंतजार है..

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!! बहुत अच्छा लिखा है।

abhishek said...

धन्यवाद