Monday, March 2, 2009

सोश्यल इंजिनियरिंग की जादूगरी

चचा हंगामीलाल शाम को ही घर पधार गए। आते ही बोले क्या बरखुरदार तुम्हारी जात क्या है जरा बताओ तो सही। सवाल जबरदस्त था और उससे भी जबरदस्त था हमारा रेस्पोंस, क्यों चचा लड़की ब्याहनी है क्या, हमारी तो पहले ही शादी हो चुकी है तुम्हें पता नहीं है क्या। अरे वो तो मुझे पता है वैसे भी अब लड़की ब्याहने के लिए जात बिरादरी देखने की उतनी जरूरत नहीं रह गई है। वो क्या है न कि चुनावी सीजन सामने है और तुम्हारी जात ठीक ठाक हो तो कुछ जुगाड़ बैठ सकता है। इन दिनों जादूगर मुखिया जाति का करिश्मा दिखाने में ही जुटे हैं। सोच रहे हैं कुछ जात का गणित बैठ जाए तो बड़ी पंचायत में कुछ जादू चल जाए। अच्छा, पर तुम्हें क्या पता कि जादूगर जी जात का पासा फेंक कर जीत की राह पर चलने की सोच रहे हैं। अरे यह तो कोई बच्चा भी समझ जाएगा। जादूगर जी ने जब अपने सहायक चुने तो हर कोई एक समाज विशेष का था और तो और जो उनमें से कोई भला मानुष अपने नाम के पीछे जाति नहीं लगाता था तो विशेष तौर पर उसकी जाति के बारे में सबको बताया गया था। नौ जने थे सूबे की नौ ख़ास जातियों से। अच्छा ऐसा क्या, अरे हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या। अब सरकारी मशीनरी के मुखिया की ही बात कर लो कौन जानता था कि जिन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति जमीनों के मुकदमों की सुनवाई करते ही हो जाना तय मान लिया था उन्हें ही सरकारी अमले की कमान सौंप दी जाएगी। अब कौन नहीं जानता कि वे जमीन की बेटी होने के कारण ही इस जगह पहुंची और ताबड़तोड़ चार घण्टे में सूबे के सरकारी अमले की सरताज हो गईं। दो ही घण्टे बाद उनके दरबार के दरबारियों के बढ़ने की खबरें आ गई। और सुबह जो दस नए दरबारी हुए उनमें भी कहीं न कहीं सोश्यल इंजिनियरिंग की जादूगरी साफ दिख रही थी। और सबसे बड़ा खेल तो तब हुआ जब बिना फायरिंग ही सूबे के पुलिस कप्तान फायर हो गए और नए कप्तान आ गए। अब चचा को झटका देने की बारी हमारी थी। हां चचा जभी आज के अखबारों में कल की खबर को लेकर परोसा गया है कि जब जादूगर सूबे के घर की देखरेख करते थे तब ही पहली बार जमीन के बेटे को सूबे की कप्तानी सौंपी गई थी। चचा बोले, हां बेटा अब सब समझ गए लगते हो। सारा खेल चुनाव का है दरअसल जादूगर जी के बारे जमीन से जुड़े लोगों का सोचना है कि जब उन्होंने पहली बार सूबे की कमान संभाली थी तब जमीन से जुड़े एक धरतीपुत्र का दावा था लेकिन पता नहीं क्या खेल हुआ। धरती पुत्र के जबरदस्त बीमार होने की बात उड़ी और कमान जादूगर जी के हाथ रही। सो वे जमीन वाले हमेशा इन्हें हक छीनने वाले के रूप में ही देखते हैं। पर जादूगर जी ऐसा नहीं सोचते हैं इसीलिए तो छोटे धरतीपुत्र को अपने साथ ले कर सूबे की प्यास बुझाने का जिम्मा दे रखा है, और अब सारा सरकारी अमला जमीन की बेटी के हवाले किया है। तो ये तो रही राज की बात अब तुम बताओ की तुम्हारी जाति का कुछ गणित हो तो बैठाएँ। चचा यही तो रोना है, ये जाति का चक्कर हमारे चलाए तो चलता ही नहीं । हम ठहरे सरस्वती की जात वाले, यदि सरस्वती पुत्रों के लिए कोई चक्कर चलता हो तो जरूर चलाओ ताकि हम भी बहती गंगा में पवित्र हो जाएँ।

4 comments:

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

इस बार व्यंग्य की धार उतनी पैनी नहीं रही. आप यथार्थ बयान करने में ही सारी स्याही खर्च कर बैठे. इतना ही हो पाया कि जिनके नाम अभिधा में मेंलिए जा सकते थे, आपने उनके नाम लक्षणा में गिना दिये. लेकिन इस तरह व्यंग्य नहीं रचा जा सका. होता है, कभी-कभी ऐसा भी.

अविनाश वाचस्पति said...

विषय चयन तो
सामयिक है।

Udan Tashtari said...

सरस्वती पुत्रों की अभी चुनावों में कोई पूछ नहीं है जी...

राजीव जैन Rajeev Jain said...

कुछ सेटिंग बेठे तो बतियेगा!