Tuesday, September 25, 2007

स्वागत है युवराज

- अभिषेक
सूबे कि रिआया इस समय बुहत खुश है, युवराज को राजसभा में औपचारिक तौर पर एक जिम्मेदार ओहदेदार के रूप में मनोनीत कर दिया गया है। और उन्हें सूबे के भावी सेनानायकों को तैयार करने वाली महत्वपूर्ण सेना की कमान सौप दी गई है। युवराज की ताजपोशी का रिआया को बेसब्री से इन्तजार था। साम्राज्ञी ने गाहे बगाहे यह संकेत दे दिए थे कि उनके बाद रिआया यदि किसी पर भरोसा कर सकती है तो वो केवल उनके लख्ते जिगर ही हो सकते हैं। दरअसल वे ये बात इतिहास को नजीर रखते हुए कहती हैं, इसलिए बेआवाज रिआया के लिए यह पूर्ण सत्य है। इतिहास गवाह है जब भी रिआया ने परिवार से बाहर नेतृत्व की कमान सौंपने की हिम्मत की है, रिआया का अपना अस्तित्व ही संकट में आ गया। विश्व भर की राजनीती मं में देश की साख बनाने वाले, बच्चों को देश का भविष्य बताने वाले, चक्रवर्ती से प्रतापी सम्राट के इस संसार से जाने के बाद जरूर रिआया को जो नेतृत्व मिला था वह परिवार से ताल्लुक नहीं रखता था। और परिवार के न होने के बावजूद उस नेतृत्व ने रिआया को सुकून और देश को विजेता का गर्व दिया था। पर देश का दुर्भाग्य था कि वे नेतृत्व कर्ता रहस्यमयी परिस्थितियों में असमय ही रिआया के बीच से उठ गए। इसके बाद रिआया फिर से परिवार के भरोसे हो गई। फिर रिआया काफी जद्दोजहद और इंडीकेट और सिडीकेट के चक्कर के बाद पूरी तरह परिवार के ही आसरे पर जिन्दा रह गई। नेतृत्व के उस दौर में भी युवराज का दौरे दौरा था। कहते हैं देश में कई अकल्पनीय लगने वाले काम और योजनाएं, पूरे परिवार नियोजन के साथ लागू के करवाने का श्रेय उस समय के युवराज को जाता है। रिआया तो युवराज के हाथ में पूरी बागडोर थमाने की बात से ही रोमांचित हो जाती थी। पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था और वे युवराज राज की कमान संभालने से पहले ही दघर्टना में चल बसे। तात्कालीन स्रामाज्ञी जिसे प्रखर विरोधी भी दुर्गा कहते थे, कालान्तर में वीर गति को प्राप्त हुईं। तो रिआया के सामने फिर से संकट खड़ा हुआ की अब कमान किसे सौंपी जाए। अन्त में दो -तीन घन्टे की जहमत के बाद परिवार के भरोसेमंद अमात्यों ने मशवीरा कर युवराज को ही रिआया और देश की कमान सौंपना उचित समझा। कालान्तर में यह युवा सम्राट भी वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन अब परिवार का शासन से मोह भंग हो गया था। परिवार ने इस बार कमान संभालने से इंकार दिया परिवार के नौनिहाल अभी पूरी तरह से वयस्क नहीं थे। राजमाता इन चक्करों में उलझना नहीं चाहती थीं। कुल मिला कर रिआया को विवश हो परिवार से बाहर के नेतृत्व पर भरोसा करना पड़ा। लेकिन क्या करें। बात परिवार से बाहर आते ही सारे सामन्त सरदार आपस में ही लड़ने लगे। नतीजा रिआया का अस्तित्व संकट में आ गया। रिआया के भरोसेमंद लोग रिआया का साथ छोड़ने लगे। स्थिति इस कदर विकट हो गई कि रिआया के चुनिंदा सामन्तों को राजमाता से कमान संभालने की गुजारिश करनी पड़ी। और उन्हें यह स्वीकारना पड़ा कि परिवार के बिना रिआया का अस्तित्व ही संकट में आ जाएगा। शुरुआती ना नुकूर के बाद राजमाता ने ने रिआया की कमान संभाल ही ली। तो रिआया की किस्मत भी सुधर गई। इस बीच शासन के नाम से घबराने वाले युवराज ने भी शासन की कला सीख ली और वे भी सभासद बन कर देश के तंत्र के अंग बन गए। अब रिआया में औपचारिक ओहदेदार हो गए हैं। तो परिवार के भरोसेमंद अमात्यों को चैन आ गया है। आखिर उनके परिवार की अमात्य परम्परा भी तो इसी प्रकार बरकरार रहेगी। राजमाता ने भविष्य की टीम बनाकर इसको सुनिश्चित कर दिया है। दिवंगत सम्राट के भरोसेमंद अमात्यों के बेटों को ही युवराज के साथ कंधे कंधा मिलाकर चलने के लिए चुना गया है। रिआया को भी करार है कि चलो परंपरा का पालन होगा। इस समय रिआया के हर कंठ से एक ही नाद गूंज रहा है......

...............स्वागत है युवराज...............

1 comment:

sanju said...

good comment on congress