Thursday, March 23, 2017

आदित्यनाथ योगी के मुख्यमंत्री बनने पर इतना हल्ला क्यों?

बहुत विचित्र स्थिति है। जो शख्स चुनाव लड़ सकता है। सांसद बन सकता है। एक बार नहीं पांच बार। वो मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। क्यों? क्योंकि वो शख्स संन्यासी है? क्योंकि वो शख्स भगवा रंग के वस्त्र पहनता है? जैसे व्यक्ति के कपड़ों का रंग ही सबकुछ होता है? रंगों के विज्ञान में जाएं तो भगवा रंग को लेकर क्या व्याख्याएं हैं यह किसी से छुपी नहीं हैं। और फिर जो सफेद कपड़े पहनते हैं वो और उनके कारनामे क्या हैं यह किससे छुपे हैं? यदि ऐसा ही है तो कोर्ट और कचहरी में काले कोट पहनने वालों को तो जाने क्या समझा जाएगा? खैर। रंग के बरअक्स राजनीतिक रंग देखने वालों को ऐसी राजनीती मुबारक। अपन तो जनता की बात करते हैं जिसने भारतीय जनता पार्टी को उत्तरप्रदेश की कमान सौंपी।पर लोग इतने पर ही
कहां चुप होते हैं। वे कहते हैं यह तो थोपे हुए हैं। थोपे हुए हैं। सही है। थोपा किसने है। नरेन्द्र मोदी ने। मोदी ही चुनाव में घूमे। कहा मुझे अवसर दो। अब उनकी इस बात का मतलब तो हर कोई समझता था। मतलब साफ था कि यदि उनकी पार्टी को जिताया तो वे किसी को अपनी तरफ से मुख्यमंत्री बनाएंगे। यह तो उत्तरप्रदेश का बच्चा भी समझता था कि मोदी स्वयं तो प्रधानमंत्री का जिम्मेदारी छोड़ कर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन नहीं जाएंगे। ऐसे में लोगों ने मोदी पर विश्वास जताया। इतना जताया कि किसी के भी समझ नहीं आया कि आखिर इतना भरोसा क्यों जताया। पर अब जब जनता ने जताया तो आप सवाल पूछने वाले कौन? खैर भाई लोकतंत्र है। सवाल पूछना आपका हक है।  पूछो। पूछना भी चाहिए। पर कितनी बार पूछोगे। सवाल ही पूछोगे या उत्तर भी सुनोगे। या नहीं सुनने का ठान लिया है। आप कहते हो योगी पर आपराधिक मुकदमे हैं। तो इसका एक ही जवाब है। जब तक योगी भारतीय संविधान के तहत चुनाव लड़ने के अधिकारी हैं तब तक वे भारतीय संविधान के तहत किसी भी लोकतांत्रिक पद पर निर्वाचित होने के अधिकारी हैं। यह बात योगी पर ही नहीं सभी पर लागू होती है। शशिकला को सुप्रीम कोर्ट से दोष सिद्धी की सजा मिलने तक उस पर भी लागू थी। उन्होंने भी मुख्यमंत्री बनने का दावा किया था और देश का मीडिया उनके दावे को सही भी ठहरा रहा था। इसके तर्क के पक्ष में कई दलीलें हैं। कई तथ्य हैं। बहुत लम्बी फेहरिस्त है। लब्बो लुआब यह कि योगी को भी उतना ही हक है जितना किसी और को। तो कपड़ों का रंग और मुकदमों का दोष उन्हें मुख्यमंत्री बनने के अधिकार से वंचित नहीं करता। वे बन भी गए। लेकिन योगी के लिए असली चुनौती अब शुरू होती है। अब वे दोराहे पर हैं। ऐसे दोराहे पर जो उनका ही नहीं इस जनमत का भी भविष्य तय करेगा।  देखना सिर्फ यह होगा कि वामपंथ की मोरलपुलिसिंग के दबाव में वे अपना नैसर्गिक काम कितना कर पाते हैं। और जाहिर है उनका नैसर्गिक काम होगा उत्तरप्रदेश को सही प्रशासनिक, सामाजिक दिशा देना। उनसे जुड़े विवादों खास तौर पर राममंदिर आंदोलन में उनकी भूमिका और अब उसे लेकर उनकी प्राथमिकताओं पर चर्चा फिर कभी।

Tuesday, March 7, 2017

लड़कियों में हार्मोनल चेंज की लक्ष्मण रेखा खींचने वाली मेनका भी गुजरीं थी उस उम्र से ...

मेनका गांधी एक बार फिर से चर्चा में हैं। पशु अधिकारों को लेकर झंडा बुलंद करने वाली केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इस बार छात्रावास में रह रही लड़कियों के रात में बाहर जाने की अनुमति नहीं देने के पीछे लड़कियों में हो रहे हार्मोनल चेंज से जोड़ा है और इसे लक्ष्मण रेखा भी करार दिया है।
इन्टरनेट पर चल रही खबरों के अनुसार मेनका गांधी से एक टीवी चैनल पर एक कार्यक्रम के दौरान लड़कियों ने कहा कि उन्हें देर रात लाईब्रेरी तक नहीं जाने दिया जाता, इस पर मेनका का जवाब था कि, 16-17 साल की उम्र में आपमें हार्मोनल चेंज आते हैं इसलिए ये लक्ष्मण रेखा बनाई गई है। कार्यक्रम के दौरान जब लड़कियों ने कहा कि लड़कों को क्यों नहीं रोका जाता तो, मेनका का प्रत्युत्तर था कि ये उन्हें एक्सीडेंट्स जैसी बाहरी दुर्घटनाओं से बचाने के लिए है।
जानी मानी पशुअधिकारविद मेनका जिस उम्र को लड़कियों के लिए हार्मोनल चेंज की उम्र बता रही हैं मेडिकल साइंस के अनुसार अधिकांश लड़कियां उससे कहीं पहले हार्मोनल चेंज यानी प्युबर्टी के दौर से गुजर जाती हैं। चिकित्साविज्ञानियों के अनुसार लड़कियों में हार्मोनल परिवर्तन का दौर 7 से 13 साल की उम्र के बीच होता है वहीं लड़कों में यह परिवर्तन 9 से 15 साल की उम्र में होता है। यानी हार्मोनल परिवर्तन के दौर से तो हकीकत में लड़के गुजर रहे होते हैं। लड़कियां तो 16-17 की उम्र तक आते आते उन परिवर्तनों की अभ्यस्त हो कर अपने आपको संभालना सीख लेती हैं।
यहां आपको यह भी बताते चलें कि  16-17 साल को हार्मोनल चेंज की उम्र बता कर उन्हें लक्ष्मण रेखा के दायरे में रखने वाली मेनका गांधी के बारे में इंटरनेट बताता है कि उनकी अपने पति संजय गांधी से पहली मुलाकात 14 दिसम्बर 1973 को हुई थी। जाने माने लेखक खुशवंत सिंह की किताब ट्रूथ, लव एंड लिटल मैलिस के इन्टरनेट पर मौजूद पुस्तकअंश में  मिसेज जी,मेनका एंड द आनन्द्स शीर्षक के तहत इस दिन एक पार्टी में मेनका और संजय की पहली मुलाकात का जिक्र मिलता है। वीकिपीडिया पर मेनका गांधी की जन्मतिथि 26 अगस्त 1956 बताई गई है। इस लिहाज से जब उनकी मुलाकात संजय गांधी से हुई थी तब उनकी उम्र थी 17 साल। यानी मेनका के अनुसार उनकी संजय गांधी से मुलाकात ऐसे दौर में हुई थी जब उन्हें लक्ष्मण रेखा के दायरे में रहना चाहिए था।
इन्टरनेट ही यह भी बताता है कि मेनका गांधी उस दौर तक मॉडलिंग शुरू कर चुकी थीं और उन्होंने एक बाथिंग टॉवल के लिए एड भी किया था। इन्टरनेट पर खोजेंगे तो वह तस्वीर भी मिल जाएगी जिसमें एक युवती बॉब कट बालों में बदन पर सीने से शुरू हो कर टखने तक को ढकता केवल एक लम्बा तौलिया लपेटे है और उस तौलिए पर भी एक महिला का चित्र बना है, और लक्ष्मण रेखा के दायरे से देखा जाए तो वह चित्र भी उस दायरे की सीमाओं को तोड़ता हुआ है। इन्टरनेट के अनुसार मेनका ने बाथिंग टॉवल का वह एड भी 1973 में किया था यानी उम्र भी वही 17 साल।
जब वे स्वयं उस दौर में मॉडलिंग कर सकती हैं, एक युवक से हुई उनकी मुलाकात उनका जीवन बदल सकती है तो लड़कियों का लाइब्रेरी में किताबें पढ़ना कैसे लक्ष्मण रेखा के दायरे में आ जाता है?
हो सकता है कि मेनका गांधी लड़कियों के साथ लगातार हो रही दुर्घटनाओं के कारण चिंतित हों और उन्हें सावधान रहने की हिदायत देना चाह रही हों। उन्होंने कहा भी है कि वे एक अभिभावक के रूप में ऐसा कह रही हैं। पर वे एक केन्द्रीय मंत्री हैं, एक आम अभिभावक नहीं। अव्यवस्थाओं के आगे झुकना उनको शोभा नहीं देता। उन्हें पहल कर के लड़कियों के लिए सुरक्षा के इंतजाम करने चाहिए ना कि उन्हें अपने कमरों में बंद रहने के लिए कहें। एक केन्द्रीय मंत्री के रूप में उन्हें तब ही महिलाओं का पैरोकार माना  जा सकेगा जब वे महिलाओं का जीवन सुगम बनाने का प्रयास करें। पशु पक्षियों के अधिकारों की उनकी चिंता को भी तब ही सार्थक माना जा सकता है जब वो इंसानों के अधिकारों की चिंता करें। जब तक लाईब्रेरी किसी एक भी व्यक्ति के लिए खुली रहे तब तक उसमें जाना और पढ़ना प्रत्येक इंसान का अधिकार है, और मेनका गांधी को लड़कियों के  इस अधिकार की रक्षा करनी चाहिए।


Friday, March 3, 2017

उत्तर प्रदेश के नतीजे तय करेंगे देश में चुनाव सुधार की दिशा_UP election's will Decide About Mid-Term Elections in India



11 मार्च। कहने को भले ही यह महज कलेण्डर की एक तारीख भर हो। लेकिन यह तारीख भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बड़ी तारीख साबित होने जा रही है। यह नोटबंदी के कड़े फैसले के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार के पहले लिटमस टेस्ट के नतीजे की तारीख है। 26 मई 2014 को जब केन्द्र में नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में कामकाज संभाला तो उसके बाद से यह यात्रा का एक करीब करीब मध्य पड़ाव है। और इस पड़ाव पर मोदी सरकार के कामकाज, उनके फैसलों पर देश का वह एक बड़ा राज्य अपना फैसला सुनाएगा जिसने 2014 में नरेन्द्र मोदी को झोली भर भर के अपना आशीर्वाद दिया था। इतना दिया कि मोदी को और किसी के आशीर्वाद की फिर जरूरत ही नहीं रही। पिछले पौने तीन साल में नरेन्द्र मोदी सरकार ने कई काम करने के दावे किए। देश – विदेश में कई रैलियां कीं। सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कड़ी कार्रवाई की तो नोटबंदी जैसा कड़ा फैसला लिया जिसने पूरे देश को कतार में खड़ा कर दिया पर राजनीतिक दलों को अलग कर दें तो आम आदमी ने मोदी के इस फैसले को कोसा नहीं, बस तकलीफ जरूर बयान की। लेकिन इस ढाई साल में मोदी सरकार के लिए पहले दिल्ली, जम्मू कश्मीर फिर महाराष्ट्र-गुजरात और बिहार के चुनाव ऐसे रहे जो सरकार की गति को अटकाते रहे। दिल्ली और बिहार के नतीजों ने मोदी को अपने फैसलों, रीति-नीति पर फिर से सोचने पर भी मजबूर कर दिया। इसी बीच नरेन्द्र मोदी सरकार को यह महसूस हुआ कि ये बार बार के चुनाव केन्द्र सरकार को खामख्वाह छोटे-मोटे जनमत संग्रहों जैसे हालात में डाल देते हैं। प्रचंड बहुमत की सरकार को भी एक एक राज्य के नतीजे का मुंह ताकना पड़ता है। और ऐसे में चुनाव सुधार को लेकर सतत चलने वाली बहस फिर से केन्द्र सरकार के जेहन में ताजा हो गई। सुरक्षा, विदेश और आर्थिक मामलों में कड़े फैसले लेने वाली नरेन्द्र मोदी सरकार को अब 11 मार्च को उत्तर प्रदेश के नतीजों का इंतजार है। ये नतीजे भारत में चुनाव सुधार की नई इबारत लिखेंगे। यदि भाजपा को उत्तर प्रदेश में जीत मिल जाती है तो देश को जल्द ही मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार रहना होगा। और यह मध्यावधि चुनाव होंगे चुनाव सुधार के लिए। अगले साल जनवरी में गुजरात और हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। जिसके बाद मार्च 2018 में मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा होगा। मई 2018 में कर्नाटक का कार्यकाल पूरा होगा वहीं दिसम्बर 2018 में मिजोरम का तो जनवरी 2019 में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान का कार्यकाल पूरा होगा। मई में सिक्किम का और जून 2019 में तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, उड़ीसा का कार्यकाल पूरा होगा। और मई 2019 को ही लोकसभा का कार्यकाल पूरा होगा। अब उत्तर प्रदेश के चुनाव से निपटने के बाद जो इसी साल जो चुनावी कवायद शुरु हो जाएगी वह होगी गुजरात औऱ हिमाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा की। और इनमें गुजरात मोदी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न रहेगा। यानी उत्तर प्रदेश के बाद बमुश्किल 3-4 महीने काम करने के बाद फिर से मोदी सरकार का इलेक्शन मोड शुरू हो जाएगा। फिर बारी होगी कर्नाटक की। और फिर उत्तरप्रदेश के बाद सबसे महत्वपूर्ण हिन्दी हार्टलैंड कहे जाने वाले छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश और राजस्थान की बारी आएगी। ये तीनों राज्य भी मोदी के लिए या यूं कहें कि भाजपा के लिए बहुत ज्यादा अहम हैं क्योंकि इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार है। इन राज्यों के नतीजों के तुरन्त बाद लोकसभा के चुनाव होंगे और चार अन्य राज्यों यानी तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा और अरूणाचल प्रदेश भी इसी के साथ होंगे। तो राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के नतीजों का सीधा असर लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा। एक तरीके से लोकसभा से पहले का सेमीफाइनल होगा। और गुजरात का चुनाव प्री क्वार्टर फाइनल तो कर्नाटक को क्वार्टरफाइनल की संज्ञा दी जा सकती है।
मोदी सरकार के एक धड़े में यह विचार बहुत तेजी से जोर पकड़ रहा है कि ये बार बार के लीग मैचों, प्री क्वार्टर फाइनल,  क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल का चक्कर ही खत्म कर दिया जाए। और इसके लिए चुनाव सुधारों का एक बड़ा और कड़ा फैसला ले लिया जाए। लेकिन यह फैसला नोटबंदी पर उत्तर प्रदेश की जनता के फैसले पर टिका होगा। यदि उत्तर प्रदेश की जनता ने किसी भी तरह से कमल खिला दिया और वहां भाजपा सरकार बना पायी तो तय मानिए कि देश जल्द ही एक ऐसे महाचुनाव में उतरेगा जिसमें लोकसभा के साथ ही करीब 9 विधानसभाओं के चुनाव हो जाएं। उत्तर प्रदेश ने ज्यादा ही झोली भर दी तो विधानसभाओं की संख्या 15 भी हो सकती है। मतदाता एक ही बूथ में दो मशीनों पर लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव के लिए बटन दबा कर आएगा। हालांकि अभी मोदी सरकार को यह तय करना है कि वो इसके लिए कौन सा समय चुनेगी। सबसे समीचीन जो समय मोदी सरकार के सलाहकार बता रहे हैं वो है दिसम्बर 2018 का। इसके लिए लोकसभा को छह माह पहले भंग करना होगा। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़, मिजोरम के चुनाव इसी समय होने हैं। लोकसभा के साथ ही तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा और अरूणाचल के चुनाव भी इन्हीं के साथ करवाए जा सकते हैं।
कुछ राजनीतिक पंडितों का तर्क है कि यदि उत्तर प्रदेश में जीत के आधार पर ही एक साथ चुनाव करवाए जाने हैं तो दिसम्बर 2018 और मार्च 2017 में बहुत फासला है। उत्तर प्रदेश की जीत सीधे सीधे नोटबंदी की जीत होगी और करीब पौने दो साल तक नोटबंदी की जीत से बने माहौल बनाए रखना चुनौती होगा। ऐसे में गुजरात चुनाव को ही आधार बना कर आगे बढ़ा जाए। पर ऐसे में बहुत सी विधानसभाओं को समय से पहले ही चुनाव में जाना पड़ेगा। लोकसभा का कार्यकाल भी करीब डेढ़ साल कम हो जाएगा। पर चुनाव सुधार को एक त्याग के रूप में दिखाने के लिए मोदी सरकार यह कड़ा फैसला भी ले सकती है। लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है कि यह सारा अगर मगर उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे पर टिका है। यदि उत्तर प्रदेश के नतीजे मोदी सरकार के खिलाफ गए तो सरकार को वैसे ही अपने तेवर बदल कर बैकफुट पर आना होगा और फिर कम से कम चुनाव सुधारों को लेकर कोई बड़े कदम की तत्काल तो उम्मीद नहीं की जा सकेगी।

Tuesday, July 19, 2016

मोदी लहर के उतार के दौर में उत्तर प्रदेश में शीला के उतरने का मतलब



उत्तर प्रदेश, राजनीतिक पंडितों के मुताबिक यही वह प्रदेश है जो यह तय करता है कि देश पर कौन राज करेगा। देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा। पिछले लोकसभा चुनावों में यहां जम कर बही मोदी लहर ने नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाया। आज जो भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार केन्द्र में है इसमें सबसे बड़ा योगदान यदि किसी का है तो वह उत्तरप्रदेश का है। देश के इस ह्रदय स्थल में भाजपा का कमल इतना खिला कि सपा के कर्णधार पिता-पुत्र मुलायम और अखिलेश साइकिल पर तो बसपा की बहन कुमारी मायावती हाथी पर सवार हो कर एक तरफ जीत का इन्तजार ही करते रह गए। इस सबके बीच कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ हो गया। माना गया कि मोदी लहर जितनी तेज बही थी उसका फायदा उठाने में भाजपा के तत्कालीन उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह की चाणक्य नीति ने भी जम कर काम किया था। शाह को तो इस जीत का ईनाम ऐसा मिला कि उन्हें पूरी भाजपा की कमान संभलवा दी गई।  
अब दो साल बाद एक बार फिर उत्तर प्रदेश में चुनावी चौसर सज रही है। लेकिन इस बार मोदी लहर गायब लग रही है। जिन अमित शाह को उत्तरप्रदेश में भाजपा की करिश्माई जीत का जादूगर माना जाता है उनका जादू उसके बाद दिल्ली और बिहार में फुस्स साबित हुआ। आसाम ने जरूर भाजपा को जिता कर मोदी शाह की गिरती साख को थामा।
लेकिन अब उत्तर प्रदेश और फिर पंजाब यह तय करेंगे कि नरेन्द्रमोदी अब भी जन नायक हैं या नहीं। मोदी के असर को बनाए रखने के लिए उत्तरप्रदेश सियासी नारों, वादों और समीकरणों से ज्यादा चुनावी गुरूओं के दावपेंचों का मैदान बन रहा है।
बिहार में मोदी को नीतीश के हाथों पटखनी दिलवा चुके पी.के. यानी प्रशान्त किशोर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की नैया पार लगाने के लिए मैदान में आए हैं। यानी मुकाबला होगा अमित शाह और प्रशान्त किशोर की रणनीतियों में और सपा के युवा सीएम अखिलेश यादव में। मायावती अभी से सधी हुई चाल खेलती नजर आ रही हैं। हालांकि चुनाव की चौसर करीब करीब सज चुकी है और सबसे पहला दांव चला है कांग्रेस और भाजपा ने। कांग्रेस ने पीके की सलाह पर दिल्ली की शीला दीक्षित को मैदान मुख्यमंत्री के रूप में उतारा है। चर्चा है कि यह ब्राह्मण वोटों पर दांव है। ब्राह्मण शब्द से यह भी जिक्र कि उत्तरप्रदेश का चुनाव हो और जाति की बात न हो यह संभव ही नहीं। मोटे तौर पर यूपी अगड़ों पिछड़ों की राजनीति से भी आगे ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, जाट, यादव, कुर्मी, लोध,दलित और मुसलमान जैसी प्रमुख वोटबैंक के खांचों में फिट होता है। अब इसमें से जिसने जितने एकक एकसाथ जोड़ लिए उसने मैदान मार लिया। इतिहास बताता है कि कांग्रेस बरसों तक ब्राह्मण+दलित+ मुसलमान के समीकरण को साध कर उत्तरप्रदेश और देश की सियासत को थामे रही है। तो कांग्रेस ने पहले चाल चलते हुए शीला दीक्षित के रूप में ब्राह्मण वोटों पर अपना दावा ठोंक दिया है। याद दिला दें कि विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस की कमान ऋता बहुगुणा जोशी यानी ब्राह्मण ही के पास थी। पर कांग्रेस का हश्र क्या हुआ ये सबको पता है। कांग्रेस बमुश्किल 29सीट जीत पाई औऱ 31 सीट पर दूसरे स्थान पर रह पाई। तो केवल अकेला ब्राह्मण फैक्टर कांग्रेस की नैया पार लगा पाएगा इसमें संदेह है। हालांकि पुराने समाजवादी राजबब्बर को प्रदेशाध्यक्ष बना कर कांग्रेस ने क्या साधा है यह अभी राजनीतिक पंडितों को भी समझ नहीं आ रहा है। माना बस इतना जा रहा है कि इससे कांग्रेस की अंदरुनी गुटबाजी पर कुछ काबू पाया जा सकेगा। कांग्रेस की नजर ब्राह्मण वोटों के साथ उस शहरी वोटर पर भी टिकी है जो दिल्ली के विकास के लिए काफी हद शीला दीक्षित को श्रेय देता है। चूंकि उत्तरप्रदेश की नौकरशाही का अपना अंदाज है तो पढ़ेलिखे अभिजात्य वर्ग को यह बात जम सकती है कि शीला दीक्षित अपने सियासी अनुभव के आधार पर उस नौकरशाही पर नकेल लगा सकती है। शीला ने अभी तक उत्तर प्रदेश को लेकर अपनी रणनीति जाहिर नहीं की है पर साफ तौर पर वे कांग्रेस के परम्परागत वोट बैंक यानी ब्राह्मण दलित मुस्लिम के लिए काम करना चाहेंगी। इन में से दलित मायावती से छिटकेंगे इसमें संदेह है। रही बात मुस्लिम की तो उनका वोट उसी को मिलेगा जो भाजपा को हराने की स्थिति में होगा। दिल्ली में दो बार करिश्माई जीत दर्ज कर चुकीं शीला उत्तर प्रदेश में क्या कर पाएंगी यह तो वक्त ही बताएगा पर इतना तय है कि उनकी साख इस मैदान में दांव पर नहीं है, बल्कि दांव पर है उनकी साख जो उन्हें मैदान में लाए हैं। यानी प्रशान्त किशोर। उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित इतनी आसान नहीं है कि उसे एक ही बार में समझ लिया जाए। आगे भाजपा सपा और बसपा बात करेंगे, साथ ही बात करेंगे बसपा में हो रही टूट फूट की और बिहार के तर्ज पर बनते बिगड़ते राजनीतिक समीकरणों की। पर एक बात तो माननी ही चाहिए कि मोदी लहर के उतार के इस दौर में प्रशान्त किशोर की सलाह मान कर शीला को मैदान में उतार कर कांग्रेस ने लगभग वाक ओवर दिए जा चुके मुकाबले में खुद की उपस्थिति तो दर्शाई है। अन्यथा उत्तरप्रदेश का मुकाबला तो त्रिकोणीय ही माना जा रहा था, शीला की मौजूदगी ने इसे चतुष्कोणीय बनाने की चर्चाएं जरूर चला दी हैं।

Monday, February 29, 2016

Budget अरूण जेटली ने जपा मंत्र अन्नदाता देवो भवः

वित्त मंत्री अरूण जेटली ने अपना तीसरा बजट पेश कर दिया और कुल मिला कर जो तस्वीर सामने उभरी है वो भविष्य की तस्वीर है। यह बजट भी मोदी सरकार के अब तक काम करने के  तरीके को आगे बढ़ाता हुआ भविष्य की सुनहरी तस्वीर खींचता है। हालांकि आयकर सीमा में कोई बदलाव नहीं हुआ पर सेवा कर पर कृषि कल्याण कर लगा कर व्यक्ति के आम जीवन को और अधिक महंगा बना दिया गया है। महंगी कारों को और महंगा किया है। सस्ती चीजों की सूची अभी नहीं आई है। बीपीएल परिवारों को गैस कनेक्शन अच्छी योजना है पर गरीबों को कनेक्शन देने में कागजात की जो मूलभूत समस्या आती है उसे कैसे दूर करेंगे? कृषि और किसानों की बहुत बात की गई है और सपना दिखाया गया है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। यह अच्छी बात है, पर इसे अमली जामा भी पहनाना होगा। मोदी सरकार की जवाबदेही तो 2019 तक की ही है। यानी यह गेंद अगली सरकार के पाले में डाली गई है। नए कर्मचारियों के लिए ईपीएफ की सरकारी हिस्सेदारी काबिलेतारीफ है। कालेधन का मुद्दा मोदी सरकार की प्राथमिकता में रहा है और इसके लिए सरकार ने एक बार फिर एक कदम उठाया है घरेलु टैक्स एमनेस्टी योजना के रूप में जिस पर 45 प्रतिशत का टैक्स देने के बाद काला धन सफेद हो जाएगा। उम्मीद करते हैं काला धन के जमाखोर बड़ी संख्या में इसका फायदा उठाएंगे। बाकि बाते सैद्धांतिक हैं और हर बजट में होती हैं।

Sunday, February 28, 2016

लोकतंत्र या कर तंत्र, आखिर budget हमें क्या बनाता जा रहा है?

 
हम लोकतंत्र में जी रहे हैं। यानी ऐसा तंत्र जो अपने नागरिकों द्वारा चलाया जाए। जाहिर है जब अपने नागरिकों द्वारा चलाया जाएगा तो इसका व्यय भी इसके ही नागरिकों द्वारा ही उठाया जाएगा। और जितना बड़ा देश उसके उतने ही बड़े खर्चे। तो जितने बड़े खर्चे उतनी ही ज्यादा राशि की जरूरत होगी खर्च करने के लिए। अब देश कोई कॉरपोरेट हाउस तो है नहीं जो कोई व्यवसाय कर अपनी कमाई करने लगे और लाभ की राशि से देश चलाए। जाहिर है पहली बात ही दोबारा कहनी होगी। यानी इसका खर्च चाहे कम हो या ज्यादा उसे नागरिकों द्वारा ही वहन किया जाएगा। बार बार कहने का मतलब यह कि देश का खर्च चलाने के लिए इसके नागरिकों को अपनी जेब से कुछ न कुछ रकम देनी ही होगी अब चाहे वह हंस कर दें या दुखी मन से दें। पर एक आम नागरिक के रूप में जब अपनी ओर से दी गई हिस्सेदारी की ओर नजर करता हूं तो पाता हूं कि अब तो सरकार मुझसे लगभग हर कार्य पर कर वसूलने लगी है। सबसे पहले आय कर यानी जो वेतन मिलता है उसके अनुरूप सरकार कर कटौती करती है। फिर उसके बाद जब बारी आती है उस वेतन को खर्च करने की तो फिर हर खर्च पर कर देना होता है। वैट के रूप में। आपने जो पैसा कमाते समय पहले ही उस कमाई के हिस्से के रूप में सरकार को कर दे दिया है उसी पैसे से आप फोन खरीदिए, कार खरीदिए, कपड़े खरीदिए, सिनेमा देखिए, या और कुछ भी खरीदिए आपको वैट के रूप में कुछ न कुछ कर चुकाना होगा। कार के साथ तो और भी विडंबना है। कार खरीदते समय वैट चुकाइए। फिर सरकार आपसे कार सड़क पर चलाने के लिए वनटाइम रोड टैक्स वसूलती है। उसके बाद आप जितनी बार कार में पेट्रोल डीजल डलवाएंगे उतनी बार आप एक लीटर पर
उत्पाद से कहीं ज्यादा कर राशि के रूप में चुकाएंगे। फिर जब आप उस कार को सड़क पर चलाएंगे तो आपको कई जगह टोल टैक्स देना होगा। इतना ही नहीं। कार को जब आप कहीं पार्क करेंगे तो आपको पार्किंग भी देनी होगी यह पार्किंग भी कहीं न कहीं सरकार को राजस्व लाभ देती है। इस सबके बाद आता है सेवा कर। यह सेवा कर आपको हर तरह की सेवा लेने पर देना होता है। मोटा मोटा समझिए तो मोबाइल का फोन बिल, बाहर किसी रेस्टोरेंट में खान- पान और जितना कितना क्या क्या।  मैंने एक उत्सुकतावश नेट पर सर्च किया कि भारत में कितने तरह के कर लागू होते हैं तो एक प्रतिष्ठित बिजनेस अखबार की वेबसाइट ने डायरेक्ट टैक्स की श्रेणी में बैंकिंग कैश ट्रांजेक्शन टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, कैपिटल गेन्स टैक्स,डबल टैक्स अवॉइडेंस ट्रीटी, फ्रिंज बेनिफिट टैक्स, सिक्युरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स, पर्सनल इन्कम टैक्स, टैक्स इन्सेंटिव जैसे करों और इनडायरेक्ट टैक्स की श्रेणी में एंटी डंपिंग ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) और इनके अलावा भी कई सारे टैक्स का जिक्र पाया। मैं चूंकि करों के इस गड़बड़झाले को ज्यादा नहीं समझता पर जितना समझा वो यह है कि  अभी तक बस जिंदा रहने और सांस लेने पर कर नहीं लगा है। और जो एक बात समझ में आई वो यह कि ये मुआ बजट ही है जो एक नया टैक्स हम पर लाद जाता है। वित्तमंत्री जी बहुत सुहाने भाषण के बीच धीरे से एक लाइन में किसी नए टैक्स की घोषणा कर जाते हैं। दरअसल ऐसा शायद इसलिए होता है कि जो मौजूदा टैक्स लागू होते हैं उन्हें ही कई रसूखदार लोग ठीक प्रकार से जमा नहीं करवाते वहीं दूसरी तरफ सरकार भी अनुत्पादक कार्यों में अपने व्यय को लगातार बढ़ाती जा रही है। मेरा तो बस इतना सा अनुरोध है वित्तमंत्री जी कृपया कर नहीं चुकाने वालों का बोझ आप आम आदमी पर मत लादिए। ये इतने सारे करों का झंझट हटा कर बस केवल एक या दो ही तरह के कर रखें जो साल में एक बार चुका दिए जाएं। अन्यथा मेरे जैसा निरीह प्राणी तो इस लोक तंत्र को कर तंत्र के रूप में ही देखने लगेगा। और मुझ जैसे आम आदमी का सबसे बड़ा डर ये मुआ बजट ही होगा। जैसे कि मुझे आज यह डर लग रहा है कि कल जब वित्त मंत्री जी लोकसभा में बजट पेश करेंगे तो देश की आर्थिक हालत सुधारने के लिए किसी कड़वी दवा के रूप में कोई नया कर न लाद जाएं। भगवान करे ऐसा न हो। मेरी आप से गुजारिश है कि आप भी यही दुआ करें।

Saturday, February 27, 2016

बजट से क्या वाकई बनता बिगड़ता है आम आदमी का बजट? Budget For common Man?

लीजिए, फिर आ गए हैं हम एक सालाना रस्मों रवायतों के और पड़ाव पर। पड़ाव यानी बजट। हर साल फरवरी माह के आखिरी दिन यह मौका आता है जब देश के वित्त मंत्री देश के अगले वित्त वर्ष का बजट पेश करते हैं। मीडिया में पिछले 17 सालों में लगातार किसी न किसी रूप में इस बजट उत्सव का अंग रहा हूं। तो कह सकता हूं कि हर बार एक सी उम्मीदें लिए बजट पर निगाहें टिकी रहती हैं। हर बार बहुत सारी पुरानी योजनाओं को नए लबादे में, नए नामों के साथ पेश होता देखता आया हूँ। और उन घोषणाओं में बहुत कम को हकीकत में धरातल पर उतरते भी देखा है। हर बार बजट पेश होने के साथ ही पक्ष के लोगों की शाबाशी औऱ प्रतिपक्ष की कमियों भरी त्वरित प्रतिक्रिया से भी दो चार होता रहा हूं। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह बजट सही मायनों में आम आदमी के लिए कितना असरकारक होता है? कोई कोई बजट होता है जो वास्तव में पूरे देश की दिशा ही बदल देता है, जैसा अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने 1991 में जब अपना पहला बजट पेश किया था, तब उन्होंने आज के भारत की तस्वीर रखी थी। उदारवाद की उस लहर ने हमारी हर युवा पीढ़ी को नए सपने दिए। पर अब कई सालों से जो बजट भाषण सुनाई देते आ रहे हैं वो महज शब्दजाल और पिछली सरकार के कामकाज से अपने कामकाज को बेहतर बताने से ज्यादा कुछ होते नहीं हैं। हर बार आयकर विवरण का एक नया फार्म जारी कर दिया जाता है। कभी कभार कर की दरों में कुछ अन्तर कर दिया जाता है। कुछ बेहद ना काम आ सकने वाली चीजों के करों पर कुछ बेहद मामूली सी कमी कर दी जाती है जो इतनी कम होती है कि आम उपभोक्ता तक उसका कोई लाभ नहीं पहुंच पाता है, वो जो दाम पहले चुका रहा होता है अब भी वही दाम चुकाता है। वहीं सेवा कर, बिक्री कर, उत्पाद कर  और उप कर जैसे ना ना प्रकार के करों के मकड़जाल में कहीं चुपके से कुछ कुछ कर बढ़ा दिए जाते हैं, जिनके बारे में आम आदमी को भी पता नहीं होता पर, जब वो बाजार जाता है तो पाता है कि बजट के बाद करीब करीब सारे उत्पादों के दामों में कुछ न कुछ उछाल आ ही जाता है। और ऐसा भी नहीं है कि सरकार इन करों को बढ़ाने के लिए बजट का ही इंतजार कर रही होती है, साल में कई बार सरकार जब चाहे तब इन करों में से किसी की भी बढ़ोतरी करने को सक्षम होती है। कहने को बजट एक ऐसा वित्त विधेयक है जो संसद की अनुमति से सरकार को सरकारी पैसे को खर्च करने का अधिकार देता है। पर सरकार इसे भी पूरी तरह से लागू नहीं कर पाती। अब तक सैकड़ों ऐसी बजट घोषणाएं हैं जो पूरा होने के इन्तजार में ऩए बजट के आने के बाद कालातीत हो चुकी हैं। यानी सरकार पर बजट घोषणाओं को पूरा करने की नैतिक बाध्यता तो है पर वह हकीकत में ऐसा करती है या नहीं इसे लेकर भी बहुत चिंता समाज में नहीं है। कुल मिला कर कहूं तो बजट ऐसी बला है जो आम आदमी का बजट बनाती नहीं बस बिगाड़ती ही बिगाड़ती है.... देखते हैं अब अरूण जेटली जी दूसरे बजट में आम आदमी के इस बजट का क्या हाल करते हैं...।

Friday, February 26, 2016

शीशे के घर वाला मीडिया

इक रहें ईर 
एक रहेंन बीर 
एक रहें फत्ते 
एक रहें हम 
ईर कहेंन चलो लकड़ी काट आई 
बीर कहेंन चलो लकड़ी काट आई 
फत्ते कहेंन चलो लकड़ी ड़ी काट आई 
हम कहें चलो, हमहू लकड़ी काट आई
ईर काटें ईर लकड़ी 
बीर काटें बीर लकड़ी 
फत्ते काटें तीन लकड़ी 
हम काटा करिलिया 

यह पंक्तियाँ हैं  हरिवंश राय बच्चन की  मशहूर कविता की मुझे याद इसलिए आ गई क्योंकि ये देखादेखी का माहौल है ईर बीर फत्ते बहुत हो गए हैं। हर कोई लकड़ी काटने में जुटा है नतीजा भले ही करिलिया ही क्यों ना हो।  अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बहुत बात हुई। कोई कुछ बोला तो किसी ने कुछ कहा।  अपने राम को ज्यादा कुछ समझ नहीं आया। सही कहूं तो हमें तो यही समझ नहीं आया कि आखिर इतना हड़कंप मचा काहे। पर जो हो इस पूरे मामले में सबका ठेका लेने वाले हमारे मीडिया तंत्र के खेमों की खेमेबंदी जरूर खुल कर सामने आ गई। हालात ये हो गए कि मीडिया ने अपने प्रतिद्वंद्वी की कलई न खोलने के अलिखित नियम की धज्जियां उड़ा दीं। इस कलई खोल अभियान ने स्वयं उनकी भी कलई खोल दी। टेप के आधार पर देश के जानने की चाह का हवाला देने वाले की दुकान उठाई भारत आजतक का दावा करने वाले ने तो टीवी की चिल्ल पौं से परे शांत अंदाज में अपना एजेंडा बढ़ाने वाले ने टीवी के पर्दे को रेडियो बना कर दूसरे प्रस्तोताओं की आवाज के अंशों को अपनी विचारधारा के तर्कों के पक्ष में पेश किया। तो  हॉट सीट पर एक हॉट अभिनेत्री का  सुपर हॉट इंटरव्यू करने के चक्कर में खुद की किरकिरी करवा चुके प्रस्तोता ने मीडिया पर न्यूज को पीछे कर  अपना निजी एजेंडा  लागू करने की रिपोर्ट पेश कर दी। 
अब मन ही मन हंसता मेरा मन राजकुमार का वह मशहूर डायलॉग याद कर ठहाका  लगाने को मचलने लगता है कि
..... जिनके घर शीशे के होते हैं वे दूसरे के घरों पे पत्थर नहीं फेंका करते... 
समझे साब.... 

Thursday, October 1, 2015

हिन्दी पढ़ने के लिए पड़ेगी विशेषज्ञों की जरूरत

शिला लेखों में छिपे अर्थ को जानने के लिए इन दिनों विशेषज्ञों की जरूरत होती है। पर शायद उन दिनों जबकि उन शिलाओं पर वो लेख खोद कर कोई संदेश लिखा गया होगा तब उस संदेश जानने के लिए विशेषज्ञों की जरूरत नहीं रही होगी। तब वो भाषा आम बोलचाल की भाषा होगी। वो लिपि लिखित अभिव्यक्ति की आम लिपि होगी। आज हमारी हिन्दी की तरह। तब भी लोग हमारी ही तरह के रहे होंगे। जो अपनी भाषा लिपि के प्रति जागरुक नहीं रहे होंगे। और नतीजा यह है कि आज उन शिला लेखों को पढ़ने के लिए उसी धरा पर जहां कभी वह भाषा लोकप्रिय रही होगी वहां विशेषज्ञों की जरुरत पड़ रही है। मेरी यह बात भले ही आज अतिश्योक्ति लग रही हो पर आंकड़े जो कहानी कह रहे हैं वह तो इसी खतरे की आहट दर्शा रहा है। नई पीढ़ी हिन्दी से दिन ब दिन दूर होती जा रही है। यह पीढ़ि दुभाषी होने की बजाय महज एक भाषी यानी अंग्रेजी भाषी ही होती जा रही है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट बता रही है अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2008-09 से 2013-14 में अंग्रेजी माध्यमों के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या दोगुनी हो गई। हालांकि इस दौरान हिन्दी माध्यमों में छात्रों की संख्या बढ़ी पर महज 25 प्रतिशत की दर से। यानी अंंग्रेजी माध्यमों की  एक चौथाई। जरा हिन्दी भाषी राज्यों की स्थिति पर भी नजर डालिए बिहार में पांच साल में अंग्रेजी माध्यम में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या में 47 गुना यानी 4700 प्रतिशत की वृद्धि हुई तो उत्तर प्रदेश में दस गुना यानी 1000 प्रतिशत और हरियाणा में 525 और झारखंड में 458 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। राजस्थान में यह वद्धि 209 प्रतिशत की रही।

 भले ही एक बात से हम संतुष्ट हो जाएं कि अभी भी हिन्दी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वालों से ज्यादा हैं पर यह साधारण सा नियम हर कोई जानता समझता है कि दोनों की वृद्धि दर का यह अन्तर आने वाले कुछ दशकों में स्थिति को किस कदर बदल कर रख देगा। अंग्रेजी स्कूलों की पढ़ाई महंगी नहीं होती तो यह अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या और भी कहीं अधिक हो सकती थी। अधिकांश अभिभावक तो हिन्दी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते ही इसलिए हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति उन्हें इसकी इजाजत नहीं देती। हालांकि यह कतई हेय नहीं है कि वे अंग्रेजी के स्कूलों में अपने बच्चों को क्यों पढ़ा रहे हैं? वर्तमान परिदृश्य में शिक्षा के बूते आजीविका चलाने वालों को अच्छी अंग्रेजी आना अनिवार्य है। जिसकी अंग्रेजी जितनी अच्छी उसके लिए अवसर भी उतने ही ज्यादा।
जाहिर है नीतिकारों को यह समझना होगा कि हम हिन्दी पढ़ने वालों के लिए अच्छे रोजगार के अवसर कैसे महुया करवाएं। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब भारत में ही हिन्दी में लिखे को पढ़ने के लिए भी विशेषज्ञ बुलाए जाएंगे।

Saturday, September 19, 2015

हिन्दी पत्रकारिता में भाषा की शुद्धताः अशुद्धियां बनाम भाषा की प्रवाहशीलता

विश्व हिन्दी सम्मेलन 2015, भोपाल में आलेख प्रस्तुति के लिए चयनित आलेख(दिनांक 11.09.2015 को सम्मेलन के राजेन्द्र माथुर सभागार में प्रस्तुत)
 - अभिषेक सिंघल
हिन्दी पत्रकारिता यानी आमजन तक पहुंचने वाला हिन्दी का सबसे विस्तृत स्वरूप। अखबार, टीवी, रेडियो, वेब साइट्स के माध्यम से रोजाना हजारों-लाखों शब्द सामान्य जन को हिन्दी से रूबरू कराते हैं। जो वे पढ़ते -देखते और सुनते हैं वही उनके लिए मानक हिन्दी है। पत्रकारिता के माध्यम से प्रचलित शब्द सामाजिक मान्यता प्राप्त कर मानकीकरण की दावेदारी में भी आ खड़े होते हैं। अंग्रेजी शब्दकोशों में हर अद्यतन के समय कई हिन्दी शब्दों का समायोजन इसका उदाहरण है। हिन्दी एक विस्तृत भूभाग की भाषा है। "इसका प्रयोग विभिन्न कार्यों में होने से उसकी शैलियां अथवा रूप सभी स्तरों पर एक प्रकार की नहीं होंगी। सरकारी कामों में प्रयुक्त हिन्दी एक प्रकार की, बोलचाल की हिन्दी दूसरे प्रकार की, विज्ञापन की हिन्दी तीसरे प्रकार की तो व्यापार में प्रयुक्त हिन्दी चौथे प्रकार की, साहित्य में प्रयुक्त हिन्दी पांचवें प्रकार की तो पत्रकारिता में प्रयुक्त हिन्दी छठे प्रकार की है। अतएव भाषा की एकरूपता पर बल देना सैद्धांतिक अधिक है, व्यावहारिक कम।”1.

    भाषा एक ऐसी सरस सलिला सरिता है जो अपने प्रवाह के दौरान निरन्तर नूतन शब्दों को जोड़ती चलती है। 1829 में पादरी आदम ने पहला शब्दकोश संपादित किया तो शब्द थे बीस हजार, 1894 में श्रीधर भाषा कोश में शब्द हुए 25 हजार, वृहद हिन्दी कोश के तीसरे संस्करण में शब्द हैं एक लाख अड़तीस हजार तो हिन्दी शब्द सागर (1965-75) में शब्दों की संख्या है दो लाख। शब्दों का यह वृद्धिमान संकेत भाषा में नए शब्दों के प्रचलन को मान्यता मिलने की पुष्टि करता है। भाषा विज्ञान का सिद्धान्त है कि कोई भी भाषा अपने मूल शब्दों के केवल 81 प्रतिशत शब्द ही रख पाती है, शेष लुप्त हो जाते हैं।2. ऐसे में वर्तमान दौर में पत्रकारिता ही भाषा को नए शब्दों के प्रयोग से यह आधुनिकता प्रदान करती है। वस्तुतः पत्रकारीय भाषा में पूर्व निर्धारित मानकों द्वारा तय शुद्धता को बनाए रखना भाषा की प्रवाहशीलता को एक दायरे में बांधना है। साथ ही यह भी एक तथ्य है कि भाषाई आधुनिकता के नाम पर पत्रकारिता के कतिपय लापरवाह प्रयोग भाषा की विकृति में भूमिका निभाते हैं। यह विकृति अंग्रेजी शब्दों के बढ़ते प्रयोग के साथ ही, व्याकरण के सिद्धान्तों के उल्लंघन और अपभ्रंश शब्दों के प्रचलन के कारण ज्यादा गंभीर हो जाती है। अस्तु पत्रकारीय हिन्दी इन विकृतियों को एक प्रकार से सामाजिक मान्यता दिलाने का काम करने लगती है। भाषा की शुद्धता पर हिन्दी पत्रकारिता में सदैव से चिंता का वातावरण रहा है। आज जब हम विश्व हिन्दी सम्मेलन में इस पर चर्चा कर रहे हैं तो 80 वर्ष पूर्व ही आचार्य शिवपूजन सहाय ने 7 अगस्त 1946 के हिमालय में लिखा था, "प्रचार के नाम पर संस्कार का संहार असह्य अनाचार है। जान पड़ता है भाषा- संहार का युग है। पत्रकारों का न इधर ध्यान है, न इसमें अनुराग ही।"3 पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता के व्याप में वृद्धि के कारण पत्रकारिता की हिन्दी में अशुद्धियों की संख्या में एकाएक बढ़ोतरी हुई है। अखबारों के साथ ही इसमें चौबीस घंटे के समाचार चैनल और हिन्दी वेबसाइट्स की भी बड़ी भूमिका है। अखबारों में तो फिर भी भाषा के मानकीकृत स्वरूप को बनाए रखने और एकीकृत प्रयोग के लिए स्टाइल शीट का प्रचलन है, किन्तु चैनल और वेबसाइट में ऐसा प्रचलन कम है। ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता में भाषायी अशुद्धता तीन प्रकार की है, एक प्रूफ रीडिंग व अज्ञानता की, दूसरी नवीनता के प्रभाव के लिए वाक्य रचना में फेरबदल की और तीसरी अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग की। पहले प्रकार की अशुद्धता वैयक्तिक है और इसका निदान पत्रकारिता में मानव संसाधन के स्तर को सुधारने से ही होगा। नई पीढ़ी के पत्रकारों को बोल चाल के स्तर की हिन्दी का ही ज्ञान होने से अज्ञानता की अशुद्धियां बढ़ रही हैं। पत्रकारों के लिए भाषा ज्ञान का मानक तय होने पर सुधार दृष्टिगोचर हो सकता है। वहीं दूसरे प्रकार की अशुद्धता को अशुद्धि माना जाए या नहीं यह विचारणीय है क्योंकि यही प्रभावोत्पादकता भाषा को नवीनता भी देती है। दरअसल पत्रकारिता की भाषा समाज की भाषा का प्रतिबिम्ब है। आचार्य विनोबा भावे ने भी इसे रेखांकित किया है, “शब्दों की अधोगति समाज की चारित्रिक गिरावट का सबूत है।” 4वहीं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भाषा की अशुद्धता को भी उसके हित में देखते हैं, वे कहते हैं, “ हिन्दी को विकृत करना भी एक लाक्षणिक प्रयोग है। इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि हिन्दी में अनुचित शब्दों का अनुचित ढंग से प्रयोग कर कोई उस भाषा को बिगाड़ता है।"5 सबसे खतरनाक है तीसरे प्रकार की अशुद्धता जो गंभीर है। इस समय अभिजात्य वर्ग के बीच अंग्रेजी के शब्दों से युक्त हिन्दी यानी हिंग्लिश का प्रचलन है। मध्यम वर्ग भी अभिजात्य वर्ग की देखादेखी इसी ओर बढ़ रहा है। वर्तमान पीढ़ी की शिक्षा का अधिकांश माध्यम अंग्रेजी है और इसी वजह से उसका हिन्दी शब्द-भंडार कमजोर है और उसे अभिव्यक्ति के लिए अंग्रेजी के शब्दों का सहारा लेना होता है। यही असर पत्रकारिता की भाषा पर भी है, क्योंकि अंततोगत्वा पत्रकारिता की भाषा लोक की भाषा है। किन्तु कभी कभी इस पत्रकारीय हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग सायास भी होता है और ऐसा अक्सर क्लिष्ट शब्दों के स्थान पर आवश्यक हो जाने पर नये शब्दों/पदबंधों की रचना करने अथवा अन्य भाषाओं से शब्द आयातित करने के संदर्भ में किया जाता है।

     सायास अशुद्धता का एक कारण बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी है। यह दबाव प्रारम्भ से ही है, 12 जनवरी 1895 को उचित वक्ता के संपादक लिखते हैं, "लेखक ग्राहकों की खोज में भाषा को भी भटकाते रहते हैं और लेख प्रणाली को स्थिर नहीं रख सकते।" 6. पत्रकारिता में नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए भाषा के साथ प्रयोग हो रहे हैं। अखबारों में शहरी आभिजात्य वर्ग के युवा द्वारा बोली जाने वाली भाषा का प्रयोग हो रहा है। आम बोल चाल की भाषा के इस दबाव के आगे अखबारों के सम्पादकीय विभाग के लोग भी घुटने टेक रहे हैं और बिना किसी सुसंगत तर्क के अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग पर विवश हो रहे हैं। साहित्यिक, कठिन, उर्दू, फारसी शब्दों एवं अलंकृत वाक्यों का प्रयोग अब काफी कम हो गया है। भाषाई शुद्धता के अनुशासन को कुछ ही अखबार अपनाते हैं। अधिकतर अखबार और माध्यम इस ओर लचीला रुख ही रखते हैं। निस्संदेह इससे भाषा का विकृत स्वरूप लोकप्रिय हो रहा है। इस पूरे परिदृश्य को संपादक और लेखक कमलेश्वर बड़ी पैनी नज़र से देखते हैं। वे कहते हैं कि "सवाल भाषा का नहीं है कि किस का प्रयोग किया जाय और किस का नहीं सवाल देश की पहचान का है।”7.

     पत्रकारिता की हिन्दी यद्यपि कई विसंगतियों से ग्रस्त है परन्तु हिन्दी के प्रचार-प्रसार से इसके विकास के उत्साह तत्व भी वहाँ मिलते हैं। हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार हिन्दी भाषी लोगों के आधार में निरन्तर वृद्धि कर रहा है। अब आवश्यकता है तो भाषा के सरल मानकीकरण के काम को द्रुत गति देते हुए इसे आमजन तक पहुंचाया जाए। भाषा में परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। "भाषा के प्रति संवेदित समाज अगर इस परिवर्तन की निगहबानी करे और स्वयं इतना उदार और संवेदनशील हो कि परिवर्तन को परिवर्तन की तरह ले तो एक व्यावहारिक पुनर्मानकीकरण संभव हो सकता है।" 8. सही शब्दों, प्रयोगों के बारे में जागरूकता लाई जाए तब ही पत्रकारिता में भी हिंग्लिश का प्रयोग हतोत्साहित होगा और हिंग्लिश की चुनौती से हिन्दी विजय प्राप्त कर पाएगी। वस्तुतः पूरक प्रकृति के होने के कारण समाज की हिन्दी में सुधार से ही पत्रकारिता की हिन्दी की अशुद्धियां भी दूर होगी।

संदर्भ
1.भाषा का समाज शास्त्र, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, पृष्ठ-74
2.भाषा का समाज शास्त्र, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, पृष्ठ -75
3.पत्रकारिताःइतिहास और प्रश्न- कृष्ण बिहारी मिश्र, पृष्ठ-127
4.पत्रकारिताःइतिहास और प्रश्न- कृष्ण बिहारी मिश्र, पृष्ठ-128
5. वही
6. हिन्दी पत्रकारिता-जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि- कृष्ण बिहारी मिश्र, पृष्ठ-468.
7. ‘मीडिया, भाषा और संस्कृति’ लेखक कमलेश्वर
8. हिन्दीः कल आज और कल, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृष्ठ -166