Thursday, September 7, 2017

कौन हैं रोहिंग्या, क्यों पहुंचे जम्मू? Who are Rohingya Muslims?



इन दिनों भारत के समाचार माध्यमों की सुर्खियों में एक कदरन नया शब्द तैर रहा है। और वह शब्द है रोहिंग्या। रोहिंग्या मुस्लिम्स। यह है पूरा शब्द। नाम से अंदाजा लग जाता है कि वे मुस्लिम हैं। पर उनके नाम के साथ उपसर्ग लगा है रोहिंग्या। वे करीब 11 लाख हैं। वे रोहिंग्या या रुइंग्गा बोली बोलते हैं।  वे म्यांमार यानी बर्मा के उत्तरी पश्चिमी प्रान्त राखिने में रहते हैं। रोहिंग्या बोली का लहजा राखिने में बोली जाने वाली अन्य भाषाओं से अलग है।उनका लहजा बांग्लादेश के चिट्टागोंग में बोली जाने वाली बंगाली के ज्यादा नजदीक है। दरअसल बौद्ध बहुल बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों को घुसपैठिया माना जाता है। रोहिंग्या मुसलमानों को बर्मा के 135 आधिकारिक सांस्कृतिक समूहों में शामिल नहीं किया गया और 1982 से ही उन्हें पूरी तरह से म्यांमार की नागरिकता देने से इनकार किया जाता रहा है। भारत में यह इन दिनों इसलिए सुर्खियों में हैं क्योंकि वे बड़ी तादात में न केवल भारत में मौजूद हैं बल्कि कई संवेदनशील इलाकों को उन्होंने अपना ठिकाना बना लिया है। कई जगहों पर उनके खिलाफ मामले भी दर्ज हुए हैं। इस सबको देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वापिस म्यांमार भेजने की कोशिशें शुरू की हैं। लेकिन दो रोहिंग्या मुसलमानों ने भारत सरकार के इन कोशिशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है जिसके बाद कोर्ट ने सरकार से इसकी वजह पूछी है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही बर्मा में विरोध
बौद्ध बहुलता वाले बर्मा ने रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति सख्त रुख अपनाया है। बर्मा के आम लोगों और सरकार का मानना है कि रोहिंग्या ुसलमानों के कारण वहां अशांति रहती है। वहां आतंककारी घटनाएं हो रही हैं। बर्मा की सेना निरन्तर रोहिंग्या आबादी की तलाशी लेती है। लगभग सभी रोहिंग्या मुसलमान राखिने के पश्चिमी तटीय क्षेत्र में रहते हैं और वे बिना सरकारी अनुमति के कहीं आने जाने के अधिकारी नहीं हैं। रोहिंग्या मुसलमानों का कहना है कि बर्मा के सैनिक उन पर जुल्म ढाते हैं। और इसके  चलते बड़ी संख्या  में रोहिंग्या मुसलमान बर्मा से यहां वहां पलायन कर रहे हैं। वहीं बर्मा सरकार का कहना है कि वे हिंसक गतिविधियों और आतंककारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है।
रोहिंग्याईयों की है अपनी सेना
रोहिंग्या मुसलमानों की एक अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी ( अर्सा) है। जिसमें बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुस्लिम युवा सम्मिलित हैं। रोहिंग्या मुसलमानों का तर्क है कि बर्मा सेना के जुल्मों सितम के प्रतिकार स्वरूप युवा इस सेना में सम्मिलित हो रहे हैं। अन्तरराष्ट्रीय विशेषज्ञ अर्सा को एक संगठित सेना नहीं मानकर युवाओके छोटे छोटे समूहों का एक संगठन मानते हैं जो चाकू,  लाठियों और बहुत हल्के स्तर के आईईडी से लैस हैं और यदा कदा पैरामिलिट्री चैकपोस्ट्स पर हमला करते रहते हैं। पर उन्हें यह आशंका है कि देर सवेर अर्सा के घरेलु आतंककारी घटनाओं को अन्तरराष्ट्रीय जेहादियों का समर्थन मिलने लगेगा। अलकायदा और तालिबान ने इसके पक्ष में बयान दे दिए हैं।
रोहिंग्याओका दावा 12 वीं शताब्दी से हैं बर्मावासी
राखिने को रोहिंग्या अराकान क्षेत्र बताते हैं। रोहिंग्याओं के एक संगठन अराकान रोहिंग्या नेशनल ऑर्गेनाइजेशन का दावा है कि रोहिंग्या अराकान में सदियों से रह रहे हैं।  अंग्रेजों के करीब सवा सौ साल ( 1824-1948) के शासन के दौरान भारत के तात्कालीन बंगाल के वर्तमान बांग्लादेश वाले क्षेत्र से बहुत बड़ी संख्या संख्या में मजदूर म्यांमार पहुंचे थे। चूंकि तब म्यांमार ब्रिटिश भारत का एक प्रान्त था और इस तरह के आव्रजन को आन्तरिक आव्रजन माना जा कर इसे सामान्य माना गया। लेकिन तब क मूल निवासियों ने मजदूरों की इस आवक को नकारात्मक लिया।इस आधार पर बौद्ध रोहिंग्याओं को बंगाली मानते हैं। ह्युमन राइट्स वाच की एक रिपोर्ट के अनुसार म्यांमार की स्वतंत्रता के बाद म्यांमार की सरकारों ने ब्रिटिश काल के दौरान हुए आव्रजन को अवैध माना और इसी आधार पर उन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया। स्वंतत्रता के बाद पारित यूनियन सिटीजनशिप एक्ट में किन सांस्कृतिक समूहों को नागरिकता दी सकती है इसको परिभाषित किया गया था और रोहिंग्या इसमें नहीं थे। हालांकि इस एक्ट में उन लोगों को परिचय पत्र के लिए आवेदन करने की अनुमति दी गई थी जिन्हें म्यामांर में रहते हुए दो पीढ़ी से ज्यादा समय हो गया था। रोहिंग्याओं को प्रारम्भ में इस तरह के परिचय पत्र भी दिए गए और पीढ़ीगत आधार पर नागरिकता तक दी गई। इस समय के दौरान कई रोहिंग्या पार्लियामेंट का हिस्सा भी रहे। 
सैन्य  तख्तापलट के बाद बदले हालात
म्यामांर में 1962 के सैन्य तख्तापलट  के बाद हालात तेजी से बदले। सभी नागरिकों के लिए नेशनल रजिस्ट्रेशन कार्ड हासिल करने जरूरी कर दिए गए। इस प्रक्रिया में रोहिंग्याओं को विदेशी परिचय पत्र जारी किए गए। जिससे वे केवल नौकरी और शैक्षणिक सुविधाओं तक सीमित रह गए। वर्ष 1982 में एक नया नागरिकता कानून पारित हुआ। इसमें 135 सांस्कृतिक समूहों को बर्मा क नागरिकताका अधिकारी बताया गया। ोहिंग्या इनमें नहीं थे और इससे रोहिंग्या पूरी तरह से राज्यविहीन हो गए। नागरिकता के तीन स्तरों में सबसे मूल स्तर ( नैचुरलाइज्ड सिटिजनशिप) के लिए व्यक्ति को एक सबूत प्रस्तुत करना अनिवार्य है कि उसका परिवार 1948 से पहले म्यामांर में रह रहा है इसके साथ ही उसे बर्मा की को एक राष्ट्रीय भाषा धारा प्रवाह आनी चाहिए। अधिकांश रोहिंग्याओं के पास इस तरह का कोई दस्तावेज नहीं था। इसके बाद उन पर कई तरह के प्रतिबंध आयद हो गए। जिसके चलते रोहिंग्याओं ने म्यांमार से बड़ी संख्या में पलायन करना शुरू कर दिया और वे बांग्लादेश, मलेशिया, थाईलैंड व अन्य दक्षिणएशियाई देशों में जाने लगे।
बांग्लादेश ने भी ठुकराया
मूलतः बांग्लादेशी माने जाने वाले इन रोहिंग्याओं को वहां भी जगह नहीं मिली।बांग्लादेश ने जो कि स्वयं ही आबादी के विस्फोट से जूझ रहा है इन्हें अपनाने से इनकार कर दिया। बांग्लादेशी सेना द्वारा इन्हें वापिस म्यामांर की सीमा में धकेला जाने लगा। जिसके बाद रोहिंग्याओं ने नया ठिकाना भारत के रूप में चुना है। बांग्लादेश रोहिंग्याओं की लगातार बढ़ती घुसपैठ से त्रस्त है और उसने म्यामांर की सेना के साथ मिल कर राखिने के सशस्त्र लड़ाकूओं के खिलाफ अभियान चलाने का प्रस्ताव दिया है।
बर्मा मानता है आतंककारी
म्यांमार की चांसलर आंग सान सू की की सरकार रोहिंग्याओं को राखिने में लगातार फैल रही हिंसा की घटनाओं के लिए जिम्मेदार मानती है। और इन्हें आतंककारी करार देती है। सरकार का मत है कि बढ़ती आतंककारी गतिविधियों के विरुद्ध उन्हें कानूनी गतिविधियों के द्वारा देश की रक्षा करने का हक है। रोहिंग्याओं पर पुलिस व सेना के साथ ही आम नागरिकों पर भी हमले करने के आरोप हैं।
क्या है अराकान रोहिंग्यान साल्वेशन आर्मी ?
अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (अर्सा) को पहले अल-यकीन फेथ मूवमेंट के रूप में जाना जाता था। इसने मार्च 2017 में अपने नए नाम के साथ एक बयान जारी किया और कहा यह रोहिंग्या समुदाय की सुरक्षा करने, नष्ट होने से बचाने, एवं संरक्षित करने के लिए कटिबद्ध है। समूह का कहना है कि वे अन्तरराष्ट्रीय कानूनों के तहत आत्मरक्षा के लिए मिले अधिकारों के जरिए पूरी क्षमता से लड़ाई लड़ेंगे। म्यामांर सरकार ने इसे आर्मी को आतंककारी संगठन घोषित कर रखा है। इस सेना ने राखिने स्टेट में पुलिस पोस्ट्स एवं सैन्य ठिकानों पर हमले की जिम्मेदारी भी ली है। अरसा उन लोगों को भी मार रहा है जिन पर उसे सरकार का  भेदिया होने का शक है। अर्सा के संबंध सउदी अरेबिया में रह रहे रोहिंग्याओं से भी होने की आशंका है।  
भारत में बड़ा सवाल जम्मू-लद्दाख तक कैसे पहुंचे?
भारत में रोहिंग्याओं के आने की खबरें लगातार बढ़ रही हैं। एक अन्तरराष्ट्रीय मीडिया एजेंसी के अनुसार करीब 40 हजार से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान भारत में आ चुके हैं जो जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, उत्तरप्रदेश व राजस्थान में पहुंच चुके हैं। इन रोहिंग्याओं के इस बड़ी संख्या में जम्मू तक पहुंचना एक बड़ी पहेली बन कर सामने आ रहा है। जम्मू व सांबा के राजीव नगर, कासिम नगर, नरवाल, भंठिड़ी, बोहड़ी, छन्नी हिम्मत नगरोटा इलाके में बसे हैं। जो इस क्षेत्र के जनसांख्यिकिय समीकरणों को प्रभावित करने वाला है। जम्मू में  पांच हजार, सांबा में 600 और लद्दाख में साढ़े सात हजार से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान पहुंच गए हैं। आखिर रोहिंग्याओं ने रहने के लिए जम्मू और लद्दाख को क्यों चुना यह भी एक बड़ा सवाल है।

Thursday, March 23, 2017

आदित्यनाथ योगी के मुख्यमंत्री बनने पर इतना हल्ला क्यों?

बहुत विचित्र स्थिति है। जो शख्स चुनाव लड़ सकता है। सांसद बन सकता है। एक बार नहीं पांच बार। वो मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। क्यों? क्योंकि वो शख्स संन्यासी है? क्योंकि वो शख्स भगवा रंग के वस्त्र पहनता है? जैसे व्यक्ति के कपड़ों का रंग ही सबकुछ होता है? रंगों के विज्ञान में जाएं तो भगवा रंग को लेकर क्या व्याख्याएं हैं यह किसी से छुपी नहीं हैं। और फिर जो सफेद कपड़े पहनते हैं वो और उनके कारनामे क्या हैं यह किससे छुपे हैं? यदि ऐसा ही है तो कोर्ट और कचहरी में काले कोट पहनने वालों को तो जाने क्या समझा जाएगा? खैर। रंग के बरअक्स राजनीतिक रंग देखने वालों को ऐसी राजनीती मुबारक। अपन तो जनता की बात करते हैं जिसने भारतीय जनता पार्टी को उत्तरप्रदेश की कमान सौंपी।पर लोग इतने पर ही
कहां चुप होते हैं। वे कहते हैं यह तो थोपे हुए हैं। थोपे हुए हैं। सही है। थोपा किसने है। नरेन्द्र मोदी ने। मोदी ही चुनाव में घूमे। कहा मुझे अवसर दो। अब उनकी इस बात का मतलब तो हर कोई समझता था। मतलब साफ था कि यदि उनकी पार्टी को जिताया तो वे किसी को अपनी तरफ से मुख्यमंत्री बनाएंगे। यह तो उत्तरप्रदेश का बच्चा भी समझता था कि मोदी स्वयं तो प्रधानमंत्री का जिम्मेदारी छोड़ कर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन नहीं जाएंगे। ऐसे में लोगों ने मोदी पर विश्वास जताया। इतना जताया कि किसी के भी समझ नहीं आया कि आखिर इतना भरोसा क्यों जताया। पर अब जब जनता ने जताया तो आप सवाल पूछने वाले कौन? खैर भाई लोकतंत्र है। सवाल पूछना आपका हक है।  पूछो। पूछना भी चाहिए। पर कितनी बार पूछोगे। सवाल ही पूछोगे या उत्तर भी सुनोगे। या नहीं सुनने का ठान लिया है। आप कहते हो योगी पर आपराधिक मुकदमे हैं। तो इसका एक ही जवाब है। जब तक योगी भारतीय संविधान के तहत चुनाव लड़ने के अधिकारी हैं तब तक वे भारतीय संविधान के तहत किसी भी लोकतांत्रिक पद पर निर्वाचित होने के अधिकारी हैं। यह बात योगी पर ही नहीं सभी पर लागू होती है। शशिकला को सुप्रीम कोर्ट से दोष सिद्धी की सजा मिलने तक उस पर भी लागू थी। उन्होंने भी मुख्यमंत्री बनने का दावा किया था और देश का मीडिया उनके दावे को सही भी ठहरा रहा था। इसके तर्क के पक्ष में कई दलीलें हैं। कई तथ्य हैं। बहुत लम्बी फेहरिस्त है। लब्बो लुआब यह कि योगी को भी उतना ही हक है जितना किसी और को। तो कपड़ों का रंग और मुकदमों का दोष उन्हें मुख्यमंत्री बनने के अधिकार से वंचित नहीं करता। वे बन भी गए। लेकिन योगी के लिए असली चुनौती अब शुरू होती है। अब वे दोराहे पर हैं। ऐसे दोराहे पर जो उनका ही नहीं इस जनमत का भी भविष्य तय करेगा।  देखना सिर्फ यह होगा कि वामपंथ की मोरलपुलिसिंग के दबाव में वे अपना नैसर्गिक काम कितना कर पाते हैं। और जाहिर है उनका नैसर्गिक काम होगा उत्तरप्रदेश को सही प्रशासनिक, सामाजिक दिशा देना। उनसे जुड़े विवादों खास तौर पर राममंदिर आंदोलन में उनकी भूमिका और अब उसे लेकर उनकी प्राथमिकताओं पर चर्चा फिर कभी।

Tuesday, March 7, 2017

लड़कियों में हार्मोनल चेंज की लक्ष्मण रेखा खींचने वाली मेनका भी गुजरीं थी उस उम्र से ...

मेनका गांधी एक बार फिर से चर्चा में हैं। पशु अधिकारों को लेकर झंडा बुलंद करने वाली केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इस बार छात्रावास में रह रही लड़कियों के रात में बाहर जाने की अनुमति नहीं देने के पीछे लड़कियों में हो रहे हार्मोनल चेंज से जोड़ा है और इसे लक्ष्मण रेखा भी करार दिया है।
इन्टरनेट पर चल रही खबरों के अनुसार मेनका गांधी से एक टीवी चैनल पर एक कार्यक्रम के दौरान लड़कियों ने कहा कि उन्हें देर रात लाईब्रेरी तक नहीं जाने दिया जाता, इस पर मेनका का जवाब था कि, 16-17 साल की उम्र में आपमें हार्मोनल चेंज आते हैं इसलिए ये लक्ष्मण रेखा बनाई गई है। कार्यक्रम के दौरान जब लड़कियों ने कहा कि लड़कों को क्यों नहीं रोका जाता तो, मेनका का प्रत्युत्तर था कि ये उन्हें एक्सीडेंट्स जैसी बाहरी दुर्घटनाओं से बचाने के लिए है।
जानी मानी पशुअधिकारविद मेनका जिस उम्र को लड़कियों के लिए हार्मोनल चेंज की उम्र बता रही हैं मेडिकल साइंस के अनुसार अधिकांश लड़कियां उससे कहीं पहले हार्मोनल चेंज यानी प्युबर्टी के दौर से गुजर जाती हैं। चिकित्साविज्ञानियों के अनुसार लड़कियों में हार्मोनल परिवर्तन का दौर 7 से 13 साल की उम्र के बीच होता है वहीं लड़कों में यह परिवर्तन 9 से 15 साल की उम्र में होता है। यानी हार्मोनल परिवर्तन के दौर से तो हकीकत में लड़के गुजर रहे होते हैं। लड़कियां तो 16-17 की उम्र तक आते आते उन परिवर्तनों की अभ्यस्त हो कर अपने आपको संभालना सीख लेती हैं।
यहां आपको यह भी बताते चलें कि  16-17 साल को हार्मोनल चेंज की उम्र बता कर उन्हें लक्ष्मण रेखा के दायरे में रखने वाली मेनका गांधी के बारे में इंटरनेट बताता है कि उनकी अपने पति संजय गांधी से पहली मुलाकात 14 दिसम्बर 1973 को हुई थी। जाने माने लेखक खुशवंत सिंह की किताब ट्रूथ, लव एंड लिटल मैलिस के इन्टरनेट पर मौजूद पुस्तकअंश में  मिसेज जी,मेनका एंड द आनन्द्स शीर्षक के तहत इस दिन एक पार्टी में मेनका और संजय की पहली मुलाकात का जिक्र मिलता है। वीकिपीडिया पर मेनका गांधी की जन्मतिथि 26 अगस्त 1956 बताई गई है। इस लिहाज से जब उनकी मुलाकात संजय गांधी से हुई थी तब उनकी उम्र थी 17 साल। यानी मेनका के अनुसार उनकी संजय गांधी से मुलाकात ऐसे दौर में हुई थी जब उन्हें लक्ष्मण रेखा के दायरे में रहना चाहिए था।
इन्टरनेट ही यह भी बताता है कि मेनका गांधी उस दौर तक मॉडलिंग शुरू कर चुकी थीं और उन्होंने एक बाथिंग टॉवल के लिए एड भी किया था। इन्टरनेट पर खोजेंगे तो वह तस्वीर भी मिल जाएगी जिसमें एक युवती बॉब कट बालों में बदन पर सीने से शुरू हो कर टखने तक को ढकता केवल एक लम्बा तौलिया लपेटे है और उस तौलिए पर भी एक महिला का चित्र बना है, और लक्ष्मण रेखा के दायरे से देखा जाए तो वह चित्र भी उस दायरे की सीमाओं को तोड़ता हुआ है। इन्टरनेट के अनुसार मेनका ने बाथिंग टॉवल का वह एड भी 1973 में किया था यानी उम्र भी वही 17 साल।
जब वे स्वयं उस दौर में मॉडलिंग कर सकती हैं, एक युवक से हुई उनकी मुलाकात उनका जीवन बदल सकती है तो लड़कियों का लाइब्रेरी में किताबें पढ़ना कैसे लक्ष्मण रेखा के दायरे में आ जाता है?
हो सकता है कि मेनका गांधी लड़कियों के साथ लगातार हो रही दुर्घटनाओं के कारण चिंतित हों और उन्हें सावधान रहने की हिदायत देना चाह रही हों। उन्होंने कहा भी है कि वे एक अभिभावक के रूप में ऐसा कह रही हैं। पर वे एक केन्द्रीय मंत्री हैं, एक आम अभिभावक नहीं। अव्यवस्थाओं के आगे झुकना उनको शोभा नहीं देता। उन्हें पहल कर के लड़कियों के लिए सुरक्षा के इंतजाम करने चाहिए ना कि उन्हें अपने कमरों में बंद रहने के लिए कहें। एक केन्द्रीय मंत्री के रूप में उन्हें तब ही महिलाओं का पैरोकार माना  जा सकेगा जब वे महिलाओं का जीवन सुगम बनाने का प्रयास करें। पशु पक्षियों के अधिकारों की उनकी चिंता को भी तब ही सार्थक माना जा सकता है जब वो इंसानों के अधिकारों की चिंता करें। जब तक लाईब्रेरी किसी एक भी व्यक्ति के लिए खुली रहे तब तक उसमें जाना और पढ़ना प्रत्येक इंसान का अधिकार है, और मेनका गांधी को लड़कियों के  इस अधिकार की रक्षा करनी चाहिए।


Friday, March 3, 2017

उत्तर प्रदेश के नतीजे तय करेंगे देश में चुनाव सुधार की दिशा_UP election's will Decide About Mid-Term Elections in India



11 मार्च। कहने को भले ही यह महज कलेण्डर की एक तारीख भर हो। लेकिन यह तारीख भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बड़ी तारीख साबित होने जा रही है। यह नोटबंदी के कड़े फैसले के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार के पहले लिटमस टेस्ट के नतीजे की तारीख है। 26 मई 2014 को जब केन्द्र में नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में कामकाज संभाला तो उसके बाद से यह यात्रा का एक करीब करीब मध्य पड़ाव है। और इस पड़ाव पर मोदी सरकार के कामकाज, उनके फैसलों पर देश का वह एक बड़ा राज्य अपना फैसला सुनाएगा जिसने 2014 में नरेन्द्र मोदी को झोली भर भर के अपना आशीर्वाद दिया था। इतना दिया कि मोदी को और किसी के आशीर्वाद की फिर जरूरत ही नहीं रही। पिछले पौने तीन साल में नरेन्द्र मोदी सरकार ने कई काम करने के दावे किए। देश – विदेश में कई रैलियां कीं। सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कड़ी कार्रवाई की तो नोटबंदी जैसा कड़ा फैसला लिया जिसने पूरे देश को कतार में खड़ा कर दिया पर राजनीतिक दलों को अलग कर दें तो आम आदमी ने मोदी के इस फैसले को कोसा नहीं, बस तकलीफ जरूर बयान की। लेकिन इस ढाई साल में मोदी सरकार के लिए पहले दिल्ली, जम्मू कश्मीर फिर महाराष्ट्र-गुजरात और बिहार के चुनाव ऐसे रहे जो सरकार की गति को अटकाते रहे। दिल्ली और बिहार के नतीजों ने मोदी को अपने फैसलों, रीति-नीति पर फिर से सोचने पर भी मजबूर कर दिया। इसी बीच नरेन्द्र मोदी सरकार को यह महसूस हुआ कि ये बार बार के चुनाव केन्द्र सरकार को खामख्वाह छोटे-मोटे जनमत संग्रहों जैसे हालात में डाल देते हैं। प्रचंड बहुमत की सरकार को भी एक एक राज्य के नतीजे का मुंह ताकना पड़ता है। और ऐसे में चुनाव सुधार को लेकर सतत चलने वाली बहस फिर से केन्द्र सरकार के जेहन में ताजा हो गई। सुरक्षा, विदेश और आर्थिक मामलों में कड़े फैसले लेने वाली नरेन्द्र मोदी सरकार को अब 11 मार्च को उत्तर प्रदेश के नतीजों का इंतजार है। ये नतीजे भारत में चुनाव सुधार की नई इबारत लिखेंगे। यदि भाजपा को उत्तर प्रदेश में जीत मिल जाती है तो देश को जल्द ही मध्यावधि चुनाव के लिए तैयार रहना होगा। और यह मध्यावधि चुनाव होंगे चुनाव सुधार के लिए। अगले साल जनवरी में गुजरात और हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। जिसके बाद मार्च 2018 में मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा होगा। मई 2018 में कर्नाटक का कार्यकाल पूरा होगा वहीं दिसम्बर 2018 में मिजोरम का तो जनवरी 2019 में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान का कार्यकाल पूरा होगा। मई में सिक्किम का और जून 2019 में तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, उड़ीसा का कार्यकाल पूरा होगा। और मई 2019 को ही लोकसभा का कार्यकाल पूरा होगा। अब उत्तर प्रदेश के चुनाव से निपटने के बाद जो इसी साल जो चुनावी कवायद शुरु हो जाएगी वह होगी गुजरात औऱ हिमाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा की। और इनमें गुजरात मोदी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न रहेगा। यानी उत्तर प्रदेश के बाद बमुश्किल 3-4 महीने काम करने के बाद फिर से मोदी सरकार का इलेक्शन मोड शुरू हो जाएगा। फिर बारी होगी कर्नाटक की। और फिर उत्तरप्रदेश के बाद सबसे महत्वपूर्ण हिन्दी हार्टलैंड कहे जाने वाले छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश और राजस्थान की बारी आएगी। ये तीनों राज्य भी मोदी के लिए या यूं कहें कि भाजपा के लिए बहुत ज्यादा अहम हैं क्योंकि इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार है। इन राज्यों के नतीजों के तुरन्त बाद लोकसभा के चुनाव होंगे और चार अन्य राज्यों यानी तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा और अरूणाचल प्रदेश भी इसी के साथ होंगे। तो राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के नतीजों का सीधा असर लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा। एक तरीके से लोकसभा से पहले का सेमीफाइनल होगा। और गुजरात का चुनाव प्री क्वार्टर फाइनल तो कर्नाटक को क्वार्टरफाइनल की संज्ञा दी जा सकती है।
मोदी सरकार के एक धड़े में यह विचार बहुत तेजी से जोर पकड़ रहा है कि ये बार बार के लीग मैचों, प्री क्वार्टर फाइनल,  क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल का चक्कर ही खत्म कर दिया जाए। और इसके लिए चुनाव सुधारों का एक बड़ा और कड़ा फैसला ले लिया जाए। लेकिन यह फैसला नोटबंदी पर उत्तर प्रदेश की जनता के फैसले पर टिका होगा। यदि उत्तर प्रदेश की जनता ने किसी भी तरह से कमल खिला दिया और वहां भाजपा सरकार बना पायी तो तय मानिए कि देश जल्द ही एक ऐसे महाचुनाव में उतरेगा जिसमें लोकसभा के साथ ही करीब 9 विधानसभाओं के चुनाव हो जाएं। उत्तर प्रदेश ने ज्यादा ही झोली भर दी तो विधानसभाओं की संख्या 15 भी हो सकती है। मतदाता एक ही बूथ में दो मशीनों पर लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव के लिए बटन दबा कर आएगा। हालांकि अभी मोदी सरकार को यह तय करना है कि वो इसके लिए कौन सा समय चुनेगी। सबसे समीचीन जो समय मोदी सरकार के सलाहकार बता रहे हैं वो है दिसम्बर 2018 का। इसके लिए लोकसभा को छह माह पहले भंग करना होगा। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़, मिजोरम के चुनाव इसी समय होने हैं। लोकसभा के साथ ही तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा और अरूणाचल के चुनाव भी इन्हीं के साथ करवाए जा सकते हैं।
कुछ राजनीतिक पंडितों का तर्क है कि यदि उत्तर प्रदेश में जीत के आधार पर ही एक साथ चुनाव करवाए जाने हैं तो दिसम्बर 2018 और मार्च 2017 में बहुत फासला है। उत्तर प्रदेश की जीत सीधे सीधे नोटबंदी की जीत होगी और करीब पौने दो साल तक नोटबंदी की जीत से बने माहौल बनाए रखना चुनौती होगा। ऐसे में गुजरात चुनाव को ही आधार बना कर आगे बढ़ा जाए। पर ऐसे में बहुत सी विधानसभाओं को समय से पहले ही चुनाव में जाना पड़ेगा। लोकसभा का कार्यकाल भी करीब डेढ़ साल कम हो जाएगा। पर चुनाव सुधार को एक त्याग के रूप में दिखाने के लिए मोदी सरकार यह कड़ा फैसला भी ले सकती है। लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है कि यह सारा अगर मगर उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे पर टिका है। यदि उत्तर प्रदेश के नतीजे मोदी सरकार के खिलाफ गए तो सरकार को वैसे ही अपने तेवर बदल कर बैकफुट पर आना होगा और फिर कम से कम चुनाव सुधारों को लेकर कोई बड़े कदम की तत्काल तो उम्मीद नहीं की जा सकेगी।

Tuesday, July 19, 2016

मोदी लहर के उतार के दौर में उत्तर प्रदेश में शीला के उतरने का मतलब



उत्तर प्रदेश, राजनीतिक पंडितों के मुताबिक यही वह प्रदेश है जो यह तय करता है कि देश पर कौन राज करेगा। देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा। पिछले लोकसभा चुनावों में यहां जम कर बही मोदी लहर ने नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाया। आज जो भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार केन्द्र में है इसमें सबसे बड़ा योगदान यदि किसी का है तो वह उत्तरप्रदेश का है। देश के इस ह्रदय स्थल में भाजपा का कमल इतना खिला कि सपा के कर्णधार पिता-पुत्र मुलायम और अखिलेश साइकिल पर तो बसपा की बहन कुमारी मायावती हाथी पर सवार हो कर एक तरफ जीत का इन्तजार ही करते रह गए। इस सबके बीच कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ हो गया। माना गया कि मोदी लहर जितनी तेज बही थी उसका फायदा उठाने में भाजपा के तत्कालीन उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह की चाणक्य नीति ने भी जम कर काम किया था। शाह को तो इस जीत का ईनाम ऐसा मिला कि उन्हें पूरी भाजपा की कमान संभलवा दी गई।  
अब दो साल बाद एक बार फिर उत्तर प्रदेश में चुनावी चौसर सज रही है। लेकिन इस बार मोदी लहर गायब लग रही है। जिन अमित शाह को उत्तरप्रदेश में भाजपा की करिश्माई जीत का जादूगर माना जाता है उनका जादू उसके बाद दिल्ली और बिहार में फुस्स साबित हुआ। आसाम ने जरूर भाजपा को जिता कर मोदी शाह की गिरती साख को थामा।
लेकिन अब उत्तर प्रदेश और फिर पंजाब यह तय करेंगे कि नरेन्द्रमोदी अब भी जन नायक हैं या नहीं। मोदी के असर को बनाए रखने के लिए उत्तरप्रदेश सियासी नारों, वादों और समीकरणों से ज्यादा चुनावी गुरूओं के दावपेंचों का मैदान बन रहा है।
बिहार में मोदी को नीतीश के हाथों पटखनी दिलवा चुके पी.के. यानी प्रशान्त किशोर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की नैया पार लगाने के लिए मैदान में आए हैं। यानी मुकाबला होगा अमित शाह और प्रशान्त किशोर की रणनीतियों में और सपा के युवा सीएम अखिलेश यादव में। मायावती अभी से सधी हुई चाल खेलती नजर आ रही हैं। हालांकि चुनाव की चौसर करीब करीब सज चुकी है और सबसे पहला दांव चला है कांग्रेस और भाजपा ने। कांग्रेस ने पीके की सलाह पर दिल्ली की शीला दीक्षित को मैदान मुख्यमंत्री के रूप में उतारा है। चर्चा है कि यह ब्राह्मण वोटों पर दांव है। ब्राह्मण शब्द से यह भी जिक्र कि उत्तरप्रदेश का चुनाव हो और जाति की बात न हो यह संभव ही नहीं। मोटे तौर पर यूपी अगड़ों पिछड़ों की राजनीति से भी आगे ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, जाट, यादव, कुर्मी, लोध,दलित और मुसलमान जैसी प्रमुख वोटबैंक के खांचों में फिट होता है। अब इसमें से जिसने जितने एकक एकसाथ जोड़ लिए उसने मैदान मार लिया। इतिहास बताता है कि कांग्रेस बरसों तक ब्राह्मण+दलित+ मुसलमान के समीकरण को साध कर उत्तरप्रदेश और देश की सियासत को थामे रही है। तो कांग्रेस ने पहले चाल चलते हुए शीला दीक्षित के रूप में ब्राह्मण वोटों पर अपना दावा ठोंक दिया है। याद दिला दें कि विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस की कमान ऋता बहुगुणा जोशी यानी ब्राह्मण ही के पास थी। पर कांग्रेस का हश्र क्या हुआ ये सबको पता है। कांग्रेस बमुश्किल 29सीट जीत पाई औऱ 31 सीट पर दूसरे स्थान पर रह पाई। तो केवल अकेला ब्राह्मण फैक्टर कांग्रेस की नैया पार लगा पाएगा इसमें संदेह है। हालांकि पुराने समाजवादी राजबब्बर को प्रदेशाध्यक्ष बना कर कांग्रेस ने क्या साधा है यह अभी राजनीतिक पंडितों को भी समझ नहीं आ रहा है। माना बस इतना जा रहा है कि इससे कांग्रेस की अंदरुनी गुटबाजी पर कुछ काबू पाया जा सकेगा। कांग्रेस की नजर ब्राह्मण वोटों के साथ उस शहरी वोटर पर भी टिकी है जो दिल्ली के विकास के लिए काफी हद शीला दीक्षित को श्रेय देता है। चूंकि उत्तरप्रदेश की नौकरशाही का अपना अंदाज है तो पढ़ेलिखे अभिजात्य वर्ग को यह बात जम सकती है कि शीला दीक्षित अपने सियासी अनुभव के आधार पर उस नौकरशाही पर नकेल लगा सकती है। शीला ने अभी तक उत्तर प्रदेश को लेकर अपनी रणनीति जाहिर नहीं की है पर साफ तौर पर वे कांग्रेस के परम्परागत वोट बैंक यानी ब्राह्मण दलित मुस्लिम के लिए काम करना चाहेंगी। इन में से दलित मायावती से छिटकेंगे इसमें संदेह है। रही बात मुस्लिम की तो उनका वोट उसी को मिलेगा जो भाजपा को हराने की स्थिति में होगा। दिल्ली में दो बार करिश्माई जीत दर्ज कर चुकीं शीला उत्तर प्रदेश में क्या कर पाएंगी यह तो वक्त ही बताएगा पर इतना तय है कि उनकी साख इस मैदान में दांव पर नहीं है, बल्कि दांव पर है उनकी साख जो उन्हें मैदान में लाए हैं। यानी प्रशान्त किशोर। उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित इतनी आसान नहीं है कि उसे एक ही बार में समझ लिया जाए। आगे भाजपा सपा और बसपा बात करेंगे, साथ ही बात करेंगे बसपा में हो रही टूट फूट की और बिहार के तर्ज पर बनते बिगड़ते राजनीतिक समीकरणों की। पर एक बात तो माननी ही चाहिए कि मोदी लहर के उतार के इस दौर में प्रशान्त किशोर की सलाह मान कर शीला को मैदान में उतार कर कांग्रेस ने लगभग वाक ओवर दिए जा चुके मुकाबले में खुद की उपस्थिति तो दर्शाई है। अन्यथा उत्तरप्रदेश का मुकाबला तो त्रिकोणीय ही माना जा रहा था, शीला की मौजूदगी ने इसे चतुष्कोणीय बनाने की चर्चाएं जरूर चला दी हैं।