Tuesday, July 19, 2016

मोदी लहर के उतार के दौर में उत्तर प्रदेश में शीला के उतरने का मतलब



उत्तर प्रदेश, राजनीतिक पंडितों के मुताबिक यही वह प्रदेश है जो यह तय करता है कि देश पर कौन राज करेगा। देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा। पिछले लोकसभा चुनावों में यहां जम कर बही मोदी लहर ने नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाया। आज जो भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार केन्द्र में है इसमें सबसे बड़ा योगदान यदि किसी का है तो वह उत्तरप्रदेश का है। देश के इस ह्रदय स्थल में भाजपा का कमल इतना खिला कि सपा के कर्णधार पिता-पुत्र मुलायम और अखिलेश साइकिल पर तो बसपा की बहन कुमारी मायावती हाथी पर सवार हो कर एक तरफ जीत का इन्तजार ही करते रह गए। इस सबके बीच कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ हो गया। माना गया कि मोदी लहर जितनी तेज बही थी उसका फायदा उठाने में भाजपा के तत्कालीन उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह की चाणक्य नीति ने भी जम कर काम किया था। शाह को तो इस जीत का ईनाम ऐसा मिला कि उन्हें पूरी भाजपा की कमान संभलवा दी गई।  
अब दो साल बाद एक बार फिर उत्तर प्रदेश में चुनावी चौसर सज रही है। लेकिन इस बार मोदी लहर गायब लग रही है। जिन अमित शाह को उत्तरप्रदेश में भाजपा की करिश्माई जीत का जादूगर माना जाता है उनका जादू उसके बाद दिल्ली और बिहार में फुस्स साबित हुआ। आसाम ने जरूर भाजपा को जिता कर मोदी शाह की गिरती साख को थामा।
लेकिन अब उत्तर प्रदेश और फिर पंजाब यह तय करेंगे कि नरेन्द्रमोदी अब भी जन नायक हैं या नहीं। मोदी के असर को बनाए रखने के लिए उत्तरप्रदेश सियासी नारों, वादों और समीकरणों से ज्यादा चुनावी गुरूओं के दावपेंचों का मैदान बन रहा है।
बिहार में मोदी को नीतीश के हाथों पटखनी दिलवा चुके पी.के. यानी प्रशान्त किशोर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की नैया पार लगाने के लिए मैदान में आए हैं। यानी मुकाबला होगा अमित शाह और प्रशान्त किशोर की रणनीतियों में और सपा के युवा सीएम अखिलेश यादव में। मायावती अभी से सधी हुई चाल खेलती नजर आ रही हैं। हालांकि चुनाव की चौसर करीब करीब सज चुकी है और सबसे पहला दांव चला है कांग्रेस और भाजपा ने। कांग्रेस ने पीके की सलाह पर दिल्ली की शीला दीक्षित को मैदान मुख्यमंत्री के रूप में उतारा है। चर्चा है कि यह ब्राह्मण वोटों पर दांव है। ब्राह्मण शब्द से यह भी जिक्र कि उत्तरप्रदेश का चुनाव हो और जाति की बात न हो यह संभव ही नहीं। मोटे तौर पर यूपी अगड़ों पिछड़ों की राजनीति से भी आगे ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, जाट, यादव, कुर्मी, लोध,दलित और मुसलमान जैसी प्रमुख वोटबैंक के खांचों में फिट होता है। अब इसमें से जिसने जितने एकक एकसाथ जोड़ लिए उसने मैदान मार लिया। इतिहास बताता है कि कांग्रेस बरसों तक ब्राह्मण+दलित+ मुसलमान के समीकरण को साध कर उत्तरप्रदेश और देश की सियासत को थामे रही है। तो कांग्रेस ने पहले चाल चलते हुए शीला दीक्षित के रूप में ब्राह्मण वोटों पर अपना दावा ठोंक दिया है। याद दिला दें कि विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस की कमान ऋता बहुगुणा जोशी यानी ब्राह्मण ही के पास थी। पर कांग्रेस का हश्र क्या हुआ ये सबको पता है। कांग्रेस बमुश्किल 29सीट जीत पाई औऱ 31 सीट पर दूसरे स्थान पर रह पाई। तो केवल अकेला ब्राह्मण फैक्टर कांग्रेस की नैया पार लगा पाएगा इसमें संदेह है। हालांकि पुराने समाजवादी राजबब्बर को प्रदेशाध्यक्ष बना कर कांग्रेस ने क्या साधा है यह अभी राजनीतिक पंडितों को भी समझ नहीं आ रहा है। माना बस इतना जा रहा है कि इससे कांग्रेस की अंदरुनी गुटबाजी पर कुछ काबू पाया जा सकेगा। कांग्रेस की नजर ब्राह्मण वोटों के साथ उस शहरी वोटर पर भी टिकी है जो दिल्ली के विकास के लिए काफी हद शीला दीक्षित को श्रेय देता है। चूंकि उत्तरप्रदेश की नौकरशाही का अपना अंदाज है तो पढ़ेलिखे अभिजात्य वर्ग को यह बात जम सकती है कि शीला दीक्षित अपने सियासी अनुभव के आधार पर उस नौकरशाही पर नकेल लगा सकती है। शीला ने अभी तक उत्तर प्रदेश को लेकर अपनी रणनीति जाहिर नहीं की है पर साफ तौर पर वे कांग्रेस के परम्परागत वोट बैंक यानी ब्राह्मण दलित मुस्लिम के लिए काम करना चाहेंगी। इन में से दलित मायावती से छिटकेंगे इसमें संदेह है। रही बात मुस्लिम की तो उनका वोट उसी को मिलेगा जो भाजपा को हराने की स्थिति में होगा। दिल्ली में दो बार करिश्माई जीत दर्ज कर चुकीं शीला उत्तर प्रदेश में क्या कर पाएंगी यह तो वक्त ही बताएगा पर इतना तय है कि उनकी साख इस मैदान में दांव पर नहीं है, बल्कि दांव पर है उनकी साख जो उन्हें मैदान में लाए हैं। यानी प्रशान्त किशोर। उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित इतनी आसान नहीं है कि उसे एक ही बार में समझ लिया जाए। आगे भाजपा सपा और बसपा बात करेंगे, साथ ही बात करेंगे बसपा में हो रही टूट फूट की और बिहार के तर्ज पर बनते बिगड़ते राजनीतिक समीकरणों की। पर एक बात तो माननी ही चाहिए कि मोदी लहर के उतार के इस दौर में प्रशान्त किशोर की सलाह मान कर शीला को मैदान में उतार कर कांग्रेस ने लगभग वाक ओवर दिए जा चुके मुकाबले में खुद की उपस्थिति तो दर्शाई है। अन्यथा उत्तरप्रदेश का मुकाबला तो त्रिकोणीय ही माना जा रहा था, शीला की मौजूदगी ने इसे चतुष्कोणीय बनाने की चर्चाएं जरूर चला दी हैं।

Monday, February 29, 2016

Budget अरूण जेटली ने जपा मंत्र अन्नदाता देवो भवः

वित्त मंत्री अरूण जेटली ने अपना तीसरा बजट पेश कर दिया और कुल मिला कर जो तस्वीर सामने उभरी है वो भविष्य की तस्वीर है। यह बजट भी मोदी सरकार के अब तक काम करने के  तरीके को आगे बढ़ाता हुआ भविष्य की सुनहरी तस्वीर खींचता है। हालांकि आयकर सीमा में कोई बदलाव नहीं हुआ पर सेवा कर पर कृषि कल्याण कर लगा कर व्यक्ति के आम जीवन को और अधिक महंगा बना दिया गया है। महंगी कारों को और महंगा किया है। सस्ती चीजों की सूची अभी नहीं आई है। बीपीएल परिवारों को गैस कनेक्शन अच्छी योजना है पर गरीबों को कनेक्शन देने में कागजात की जो मूलभूत समस्या आती है उसे कैसे दूर करेंगे? कृषि और किसानों की बहुत बात की गई है और सपना दिखाया गया है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। यह अच्छी बात है, पर इसे अमली जामा भी पहनाना होगा। मोदी सरकार की जवाबदेही तो 2019 तक की ही है। यानी यह गेंद अगली सरकार के पाले में डाली गई है। नए कर्मचारियों के लिए ईपीएफ की सरकारी हिस्सेदारी काबिलेतारीफ है। कालेधन का मुद्दा मोदी सरकार की प्राथमिकता में रहा है और इसके लिए सरकार ने एक बार फिर एक कदम उठाया है घरेलु टैक्स एमनेस्टी योजना के रूप में जिस पर 45 प्रतिशत का टैक्स देने के बाद काला धन सफेद हो जाएगा। उम्मीद करते हैं काला धन के जमाखोर बड़ी संख्या में इसका फायदा उठाएंगे। बाकि बाते सैद्धांतिक हैं और हर बजट में होती हैं।

Sunday, February 28, 2016

लोकतंत्र या कर तंत्र, आखिर budget हमें क्या बनाता जा रहा है?

 
हम लोकतंत्र में जी रहे हैं। यानी ऐसा तंत्र जो अपने नागरिकों द्वारा चलाया जाए। जाहिर है जब अपने नागरिकों द्वारा चलाया जाएगा तो इसका व्यय भी इसके ही नागरिकों द्वारा ही उठाया जाएगा। और जितना बड़ा देश उसके उतने ही बड़े खर्चे। तो जितने बड़े खर्चे उतनी ही ज्यादा राशि की जरूरत होगी खर्च करने के लिए। अब देश कोई कॉरपोरेट हाउस तो है नहीं जो कोई व्यवसाय कर अपनी कमाई करने लगे और लाभ की राशि से देश चलाए। जाहिर है पहली बात ही दोबारा कहनी होगी। यानी इसका खर्च चाहे कम हो या ज्यादा उसे नागरिकों द्वारा ही वहन किया जाएगा। बार बार कहने का मतलब यह कि देश का खर्च चलाने के लिए इसके नागरिकों को अपनी जेब से कुछ न कुछ रकम देनी ही होगी अब चाहे वह हंस कर दें या दुखी मन से दें। पर एक आम नागरिक के रूप में जब अपनी ओर से दी गई हिस्सेदारी की ओर नजर करता हूं तो पाता हूं कि अब तो सरकार मुझसे लगभग हर कार्य पर कर वसूलने लगी है। सबसे पहले आय कर यानी जो वेतन मिलता है उसके अनुरूप सरकार कर कटौती करती है। फिर उसके बाद जब बारी आती है उस वेतन को खर्च करने की तो फिर हर खर्च पर कर देना होता है। वैट के रूप में। आपने जो पैसा कमाते समय पहले ही उस कमाई के हिस्से के रूप में सरकार को कर दे दिया है उसी पैसे से आप फोन खरीदिए, कार खरीदिए, कपड़े खरीदिए, सिनेमा देखिए, या और कुछ भी खरीदिए आपको वैट के रूप में कुछ न कुछ कर चुकाना होगा। कार के साथ तो और भी विडंबना है। कार खरीदते समय वैट चुकाइए। फिर सरकार आपसे कार सड़क पर चलाने के लिए वनटाइम रोड टैक्स वसूलती है। उसके बाद आप जितनी बार कार में पेट्रोल डीजल डलवाएंगे उतनी बार आप एक लीटर पर
उत्पाद से कहीं ज्यादा कर राशि के रूप में चुकाएंगे। फिर जब आप उस कार को सड़क पर चलाएंगे तो आपको कई जगह टोल टैक्स देना होगा। इतना ही नहीं। कार को जब आप कहीं पार्क करेंगे तो आपको पार्किंग भी देनी होगी यह पार्किंग भी कहीं न कहीं सरकार को राजस्व लाभ देती है। इस सबके बाद आता है सेवा कर। यह सेवा कर आपको हर तरह की सेवा लेने पर देना होता है। मोटा मोटा समझिए तो मोबाइल का फोन बिल, बाहर किसी रेस्टोरेंट में खान- पान और जितना कितना क्या क्या।  मैंने एक उत्सुकतावश नेट पर सर्च किया कि भारत में कितने तरह के कर लागू होते हैं तो एक प्रतिष्ठित बिजनेस अखबार की वेबसाइट ने डायरेक्ट टैक्स की श्रेणी में बैंकिंग कैश ट्रांजेक्शन टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, कैपिटल गेन्स टैक्स,डबल टैक्स अवॉइडेंस ट्रीटी, फ्रिंज बेनिफिट टैक्स, सिक्युरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स, पर्सनल इन्कम टैक्स, टैक्स इन्सेंटिव जैसे करों और इनडायरेक्ट टैक्स की श्रेणी में एंटी डंपिंग ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) और इनके अलावा भी कई सारे टैक्स का जिक्र पाया। मैं चूंकि करों के इस गड़बड़झाले को ज्यादा नहीं समझता पर जितना समझा वो यह है कि  अभी तक बस जिंदा रहने और सांस लेने पर कर नहीं लगा है। और जो एक बात समझ में आई वो यह कि ये मुआ बजट ही है जो एक नया टैक्स हम पर लाद जाता है। वित्तमंत्री जी बहुत सुहाने भाषण के बीच धीरे से एक लाइन में किसी नए टैक्स की घोषणा कर जाते हैं। दरअसल ऐसा शायद इसलिए होता है कि जो मौजूदा टैक्स लागू होते हैं उन्हें ही कई रसूखदार लोग ठीक प्रकार से जमा नहीं करवाते वहीं दूसरी तरफ सरकार भी अनुत्पादक कार्यों में अपने व्यय को लगातार बढ़ाती जा रही है। मेरा तो बस इतना सा अनुरोध है वित्तमंत्री जी कृपया कर नहीं चुकाने वालों का बोझ आप आम आदमी पर मत लादिए। ये इतने सारे करों का झंझट हटा कर बस केवल एक या दो ही तरह के कर रखें जो साल में एक बार चुका दिए जाएं। अन्यथा मेरे जैसा निरीह प्राणी तो इस लोक तंत्र को कर तंत्र के रूप में ही देखने लगेगा। और मुझ जैसे आम आदमी का सबसे बड़ा डर ये मुआ बजट ही होगा। जैसे कि मुझे आज यह डर लग रहा है कि कल जब वित्त मंत्री जी लोकसभा में बजट पेश करेंगे तो देश की आर्थिक हालत सुधारने के लिए किसी कड़वी दवा के रूप में कोई नया कर न लाद जाएं। भगवान करे ऐसा न हो। मेरी आप से गुजारिश है कि आप भी यही दुआ करें।

Saturday, February 27, 2016

बजट से क्या वाकई बनता बिगड़ता है आम आदमी का बजट? Budget For common Man?

लीजिए, फिर आ गए हैं हम एक सालाना रस्मों रवायतों के और पड़ाव पर। पड़ाव यानी बजट। हर साल फरवरी माह के आखिरी दिन यह मौका आता है जब देश के वित्त मंत्री देश के अगले वित्त वर्ष का बजट पेश करते हैं। मीडिया में पिछले 17 सालों में लगातार किसी न किसी रूप में इस बजट उत्सव का अंग रहा हूं। तो कह सकता हूं कि हर बार एक सी उम्मीदें लिए बजट पर निगाहें टिकी रहती हैं। हर बार बहुत सारी पुरानी योजनाओं को नए लबादे में, नए नामों के साथ पेश होता देखता आया हूँ। और उन घोषणाओं में बहुत कम को हकीकत में धरातल पर उतरते भी देखा है। हर बार बजट पेश होने के साथ ही पक्ष के लोगों की शाबाशी औऱ प्रतिपक्ष की कमियों भरी त्वरित प्रतिक्रिया से भी दो चार होता रहा हूं। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह बजट सही मायनों में आम आदमी के लिए कितना असरकारक होता है? कोई कोई बजट होता है जो वास्तव में पूरे देश की दिशा ही बदल देता है, जैसा अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने 1991 में जब अपना पहला बजट पेश किया था, तब उन्होंने आज के भारत की तस्वीर रखी थी। उदारवाद की उस लहर ने हमारी हर युवा पीढ़ी को नए सपने दिए। पर अब कई सालों से जो बजट भाषण सुनाई देते आ रहे हैं वो महज शब्दजाल और पिछली सरकार के कामकाज से अपने कामकाज को बेहतर बताने से ज्यादा कुछ होते नहीं हैं। हर बार आयकर विवरण का एक नया फार्म जारी कर दिया जाता है। कभी कभार कर की दरों में कुछ अन्तर कर दिया जाता है। कुछ बेहद ना काम आ सकने वाली चीजों के करों पर कुछ बेहद मामूली सी कमी कर दी जाती है जो इतनी कम होती है कि आम उपभोक्ता तक उसका कोई लाभ नहीं पहुंच पाता है, वो जो दाम पहले चुका रहा होता है अब भी वही दाम चुकाता है। वहीं सेवा कर, बिक्री कर, उत्पाद कर  और उप कर जैसे ना ना प्रकार के करों के मकड़जाल में कहीं चुपके से कुछ कुछ कर बढ़ा दिए जाते हैं, जिनके बारे में आम आदमी को भी पता नहीं होता पर, जब वो बाजार जाता है तो पाता है कि बजट के बाद करीब करीब सारे उत्पादों के दामों में कुछ न कुछ उछाल आ ही जाता है। और ऐसा भी नहीं है कि सरकार इन करों को बढ़ाने के लिए बजट का ही इंतजार कर रही होती है, साल में कई बार सरकार जब चाहे तब इन करों में से किसी की भी बढ़ोतरी करने को सक्षम होती है। कहने को बजट एक ऐसा वित्त विधेयक है जो संसद की अनुमति से सरकार को सरकारी पैसे को खर्च करने का अधिकार देता है। पर सरकार इसे भी पूरी तरह से लागू नहीं कर पाती। अब तक सैकड़ों ऐसी बजट घोषणाएं हैं जो पूरा होने के इन्तजार में ऩए बजट के आने के बाद कालातीत हो चुकी हैं। यानी सरकार पर बजट घोषणाओं को पूरा करने की नैतिक बाध्यता तो है पर वह हकीकत में ऐसा करती है या नहीं इसे लेकर भी बहुत चिंता समाज में नहीं है। कुल मिला कर कहूं तो बजट ऐसी बला है जो आम आदमी का बजट बनाती नहीं बस बिगाड़ती ही बिगाड़ती है.... देखते हैं अब अरूण जेटली जी दूसरे बजट में आम आदमी के इस बजट का क्या हाल करते हैं...।

Friday, February 26, 2016

शीशे के घर वाला मीडिया

इक रहें ईर 
एक रहेंन बीर 
एक रहें फत्ते 
एक रहें हम 
ईर कहेंन चलो लकड़ी काट आई 
बीर कहेंन चलो लकड़ी काट आई 
फत्ते कहेंन चलो लकड़ी ड़ी काट आई 
हम कहें चलो, हमहू लकड़ी काट आई
ईर काटें ईर लकड़ी 
बीर काटें बीर लकड़ी 
फत्ते काटें तीन लकड़ी 
हम काटा करिलिया 

यह पंक्तियाँ हैं  हरिवंश राय बच्चन की  मशहूर कविता की मुझे याद इसलिए आ गई क्योंकि ये देखादेखी का माहौल है ईर बीर फत्ते बहुत हो गए हैं। हर कोई लकड़ी काटने में जुटा है नतीजा भले ही करिलिया ही क्यों ना हो।  अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बहुत बात हुई। कोई कुछ बोला तो किसी ने कुछ कहा।  अपने राम को ज्यादा कुछ समझ नहीं आया। सही कहूं तो हमें तो यही समझ नहीं आया कि आखिर इतना हड़कंप मचा काहे। पर जो हो इस पूरे मामले में सबका ठेका लेने वाले हमारे मीडिया तंत्र के खेमों की खेमेबंदी जरूर खुल कर सामने आ गई। हालात ये हो गए कि मीडिया ने अपने प्रतिद्वंद्वी की कलई न खोलने के अलिखित नियम की धज्जियां उड़ा दीं। इस कलई खोल अभियान ने स्वयं उनकी भी कलई खोल दी। टेप के आधार पर देश के जानने की चाह का हवाला देने वाले की दुकान उठाई भारत आजतक का दावा करने वाले ने तो टीवी की चिल्ल पौं से परे शांत अंदाज में अपना एजेंडा बढ़ाने वाले ने टीवी के पर्दे को रेडियो बना कर दूसरे प्रस्तोताओं की आवाज के अंशों को अपनी विचारधारा के तर्कों के पक्ष में पेश किया। तो  हॉट सीट पर एक हॉट अभिनेत्री का  सुपर हॉट इंटरव्यू करने के चक्कर में खुद की किरकिरी करवा चुके प्रस्तोता ने मीडिया पर न्यूज को पीछे कर  अपना निजी एजेंडा  लागू करने की रिपोर्ट पेश कर दी। 
अब मन ही मन हंसता मेरा मन राजकुमार का वह मशहूर डायलॉग याद कर ठहाका  लगाने को मचलने लगता है कि
..... जिनके घर शीशे के होते हैं वे दूसरे के घरों पे पत्थर नहीं फेंका करते... 
समझे साब.... 

Thursday, October 1, 2015

हिन्दी पढ़ने के लिए पड़ेगी विशेषज्ञों की जरूरत

शिला लेखों में छिपे अर्थ को जानने के लिए इन दिनों विशेषज्ञों की जरूरत होती है। पर शायद उन दिनों जबकि उन शिलाओं पर वो लेख खोद कर कोई संदेश लिखा गया होगा तब उस संदेश जानने के लिए विशेषज्ञों की जरूरत नहीं रही होगी। तब वो भाषा आम बोलचाल की भाषा होगी। वो लिपि लिखित अभिव्यक्ति की आम लिपि होगी। आज हमारी हिन्दी की तरह। तब भी लोग हमारी ही तरह के रहे होंगे। जो अपनी भाषा लिपि के प्रति जागरुक नहीं रहे होंगे। और नतीजा यह है कि आज उन शिला लेखों को पढ़ने के लिए उसी धरा पर जहां कभी वह भाषा लोकप्रिय रही होगी वहां विशेषज्ञों की जरुरत पड़ रही है। मेरी यह बात भले ही आज अतिश्योक्ति लग रही हो पर आंकड़े जो कहानी कह रहे हैं वह तो इसी खतरे की आहट दर्शा रहा है। नई पीढ़ी हिन्दी से दिन ब दिन दूर होती जा रही है। यह पीढ़ि दुभाषी होने की बजाय महज एक भाषी यानी अंग्रेजी भाषी ही होती जा रही है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट बता रही है अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2008-09 से 2013-14 में अंग्रेजी माध्यमों के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या दोगुनी हो गई। हालांकि इस दौरान हिन्दी माध्यमों में छात्रों की संख्या बढ़ी पर महज 25 प्रतिशत की दर से। यानी अंंग्रेजी माध्यमों की  एक चौथाई। जरा हिन्दी भाषी राज्यों की स्थिति पर भी नजर डालिए बिहार में पांच साल में अंग्रेजी माध्यम में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या में 47 गुना यानी 4700 प्रतिशत की वृद्धि हुई तो उत्तर प्रदेश में दस गुना यानी 1000 प्रतिशत और हरियाणा में 525 और झारखंड में 458 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। राजस्थान में यह वद्धि 209 प्रतिशत की रही।

 भले ही एक बात से हम संतुष्ट हो जाएं कि अभी भी हिन्दी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वालों से ज्यादा हैं पर यह साधारण सा नियम हर कोई जानता समझता है कि दोनों की वृद्धि दर का यह अन्तर आने वाले कुछ दशकों में स्थिति को किस कदर बदल कर रख देगा। अंग्रेजी स्कूलों की पढ़ाई महंगी नहीं होती तो यह अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या और भी कहीं अधिक हो सकती थी। अधिकांश अभिभावक तो हिन्दी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते ही इसलिए हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति उन्हें इसकी इजाजत नहीं देती। हालांकि यह कतई हेय नहीं है कि वे अंग्रेजी के स्कूलों में अपने बच्चों को क्यों पढ़ा रहे हैं? वर्तमान परिदृश्य में शिक्षा के बूते आजीविका चलाने वालों को अच्छी अंग्रेजी आना अनिवार्य है। जिसकी अंग्रेजी जितनी अच्छी उसके लिए अवसर भी उतने ही ज्यादा।
जाहिर है नीतिकारों को यह समझना होगा कि हम हिन्दी पढ़ने वालों के लिए अच्छे रोजगार के अवसर कैसे महुया करवाएं। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब भारत में ही हिन्दी में लिखे को पढ़ने के लिए भी विशेषज्ञ बुलाए जाएंगे।

Saturday, September 19, 2015

हिन्दी पत्रकारिता में भाषा की शुद्धताः अशुद्धियां बनाम भाषा की प्रवाहशीलता

विश्व हिन्दी सम्मेलन 2015, भोपाल में आलेख प्रस्तुति के लिए चयनित आलेख(दिनांक 11.09.2015 को सम्मेलन के राजेन्द्र माथुर सभागार में प्रस्तुत)
 - अभिषेक सिंघल
हिन्दी पत्रकारिता यानी आमजन तक पहुंचने वाला हिन्दी का सबसे विस्तृत स्वरूप। अखबार, टीवी, रेडियो, वेब साइट्स के माध्यम से रोजाना हजारों-लाखों शब्द सामान्य जन को हिन्दी से रूबरू कराते हैं। जो वे पढ़ते -देखते और सुनते हैं वही उनके लिए मानक हिन्दी है। पत्रकारिता के माध्यम से प्रचलित शब्द सामाजिक मान्यता प्राप्त कर मानकीकरण की दावेदारी में भी आ खड़े होते हैं। अंग्रेजी शब्दकोशों में हर अद्यतन के समय कई हिन्दी शब्दों का समायोजन इसका उदाहरण है। हिन्दी एक विस्तृत भूभाग की भाषा है। "इसका प्रयोग विभिन्न कार्यों में होने से उसकी शैलियां अथवा रूप सभी स्तरों पर एक प्रकार की नहीं होंगी। सरकारी कामों में प्रयुक्त हिन्दी एक प्रकार की, बोलचाल की हिन्दी दूसरे प्रकार की, विज्ञापन की हिन्दी तीसरे प्रकार की तो व्यापार में प्रयुक्त हिन्दी चौथे प्रकार की, साहित्य में प्रयुक्त हिन्दी पांचवें प्रकार की तो पत्रकारिता में प्रयुक्त हिन्दी छठे प्रकार की है। अतएव भाषा की एकरूपता पर बल देना सैद्धांतिक अधिक है, व्यावहारिक कम।”1.

    भाषा एक ऐसी सरस सलिला सरिता है जो अपने प्रवाह के दौरान निरन्तर नूतन शब्दों को जोड़ती चलती है। 1829 में पादरी आदम ने पहला शब्दकोश संपादित किया तो शब्द थे बीस हजार, 1894 में श्रीधर भाषा कोश में शब्द हुए 25 हजार, वृहद हिन्दी कोश के तीसरे संस्करण में शब्द हैं एक लाख अड़तीस हजार तो हिन्दी शब्द सागर (1965-75) में शब्दों की संख्या है दो लाख। शब्दों का यह वृद्धिमान संकेत भाषा में नए शब्दों के प्रचलन को मान्यता मिलने की पुष्टि करता है। भाषा विज्ञान का सिद्धान्त है कि कोई भी भाषा अपने मूल शब्दों के केवल 81 प्रतिशत शब्द ही रख पाती है, शेष लुप्त हो जाते हैं।2. ऐसे में वर्तमान दौर में पत्रकारिता ही भाषा को नए शब्दों के प्रयोग से यह आधुनिकता प्रदान करती है। वस्तुतः पत्रकारीय भाषा में पूर्व निर्धारित मानकों द्वारा तय शुद्धता को बनाए रखना भाषा की प्रवाहशीलता को एक दायरे में बांधना है। साथ ही यह भी एक तथ्य है कि भाषाई आधुनिकता के नाम पर पत्रकारिता के कतिपय लापरवाह प्रयोग भाषा की विकृति में भूमिका निभाते हैं। यह विकृति अंग्रेजी शब्दों के बढ़ते प्रयोग के साथ ही, व्याकरण के सिद्धान्तों के उल्लंघन और अपभ्रंश शब्दों के प्रचलन के कारण ज्यादा गंभीर हो जाती है। अस्तु पत्रकारीय हिन्दी इन विकृतियों को एक प्रकार से सामाजिक मान्यता दिलाने का काम करने लगती है। भाषा की शुद्धता पर हिन्दी पत्रकारिता में सदैव से चिंता का वातावरण रहा है। आज जब हम विश्व हिन्दी सम्मेलन में इस पर चर्चा कर रहे हैं तो 80 वर्ष पूर्व ही आचार्य शिवपूजन सहाय ने 7 अगस्त 1946 के हिमालय में लिखा था, "प्रचार के नाम पर संस्कार का संहार असह्य अनाचार है। जान पड़ता है भाषा- संहार का युग है। पत्रकारों का न इधर ध्यान है, न इसमें अनुराग ही।"3 पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता के व्याप में वृद्धि के कारण पत्रकारिता की हिन्दी में अशुद्धियों की संख्या में एकाएक बढ़ोतरी हुई है। अखबारों के साथ ही इसमें चौबीस घंटे के समाचार चैनल और हिन्दी वेबसाइट्स की भी बड़ी भूमिका है। अखबारों में तो फिर भी भाषा के मानकीकृत स्वरूप को बनाए रखने और एकीकृत प्रयोग के लिए स्टाइल शीट का प्रचलन है, किन्तु चैनल और वेबसाइट में ऐसा प्रचलन कम है। ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता में भाषायी अशुद्धता तीन प्रकार की है, एक प्रूफ रीडिंग व अज्ञानता की, दूसरी नवीनता के प्रभाव के लिए वाक्य रचना में फेरबदल की और तीसरी अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग की। पहले प्रकार की अशुद्धता वैयक्तिक है और इसका निदान पत्रकारिता में मानव संसाधन के स्तर को सुधारने से ही होगा। नई पीढ़ी के पत्रकारों को बोल चाल के स्तर की हिन्दी का ही ज्ञान होने से अज्ञानता की अशुद्धियां बढ़ रही हैं। पत्रकारों के लिए भाषा ज्ञान का मानक तय होने पर सुधार दृष्टिगोचर हो सकता है। वहीं दूसरे प्रकार की अशुद्धता को अशुद्धि माना जाए या नहीं यह विचारणीय है क्योंकि यही प्रभावोत्पादकता भाषा को नवीनता भी देती है। दरअसल पत्रकारिता की भाषा समाज की भाषा का प्रतिबिम्ब है। आचार्य विनोबा भावे ने भी इसे रेखांकित किया है, “शब्दों की अधोगति समाज की चारित्रिक गिरावट का सबूत है।” 4वहीं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भाषा की अशुद्धता को भी उसके हित में देखते हैं, वे कहते हैं, “ हिन्दी को विकृत करना भी एक लाक्षणिक प्रयोग है। इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि हिन्दी में अनुचित शब्दों का अनुचित ढंग से प्रयोग कर कोई उस भाषा को बिगाड़ता है।"5 सबसे खतरनाक है तीसरे प्रकार की अशुद्धता जो गंभीर है। इस समय अभिजात्य वर्ग के बीच अंग्रेजी के शब्दों से युक्त हिन्दी यानी हिंग्लिश का प्रचलन है। मध्यम वर्ग भी अभिजात्य वर्ग की देखादेखी इसी ओर बढ़ रहा है। वर्तमान पीढ़ी की शिक्षा का अधिकांश माध्यम अंग्रेजी है और इसी वजह से उसका हिन्दी शब्द-भंडार कमजोर है और उसे अभिव्यक्ति के लिए अंग्रेजी के शब्दों का सहारा लेना होता है। यही असर पत्रकारिता की भाषा पर भी है, क्योंकि अंततोगत्वा पत्रकारिता की भाषा लोक की भाषा है। किन्तु कभी कभी इस पत्रकारीय हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग सायास भी होता है और ऐसा अक्सर क्लिष्ट शब्दों के स्थान पर आवश्यक हो जाने पर नये शब्दों/पदबंधों की रचना करने अथवा अन्य भाषाओं से शब्द आयातित करने के संदर्भ में किया जाता है।

     सायास अशुद्धता का एक कारण बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी है। यह दबाव प्रारम्भ से ही है, 12 जनवरी 1895 को उचित वक्ता के संपादक लिखते हैं, "लेखक ग्राहकों की खोज में भाषा को भी भटकाते रहते हैं और लेख प्रणाली को स्थिर नहीं रख सकते।" 6. पत्रकारिता में नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए भाषा के साथ प्रयोग हो रहे हैं। अखबारों में शहरी आभिजात्य वर्ग के युवा द्वारा बोली जाने वाली भाषा का प्रयोग हो रहा है। आम बोल चाल की भाषा के इस दबाव के आगे अखबारों के सम्पादकीय विभाग के लोग भी घुटने टेक रहे हैं और बिना किसी सुसंगत तर्क के अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग पर विवश हो रहे हैं। साहित्यिक, कठिन, उर्दू, फारसी शब्दों एवं अलंकृत वाक्यों का प्रयोग अब काफी कम हो गया है। भाषाई शुद्धता के अनुशासन को कुछ ही अखबार अपनाते हैं। अधिकतर अखबार और माध्यम इस ओर लचीला रुख ही रखते हैं। निस्संदेह इससे भाषा का विकृत स्वरूप लोकप्रिय हो रहा है। इस पूरे परिदृश्य को संपादक और लेखक कमलेश्वर बड़ी पैनी नज़र से देखते हैं। वे कहते हैं कि "सवाल भाषा का नहीं है कि किस का प्रयोग किया जाय और किस का नहीं सवाल देश की पहचान का है।”7.

     पत्रकारिता की हिन्दी यद्यपि कई विसंगतियों से ग्रस्त है परन्तु हिन्दी के प्रचार-प्रसार से इसके विकास के उत्साह तत्व भी वहाँ मिलते हैं। हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार हिन्दी भाषी लोगों के आधार में निरन्तर वृद्धि कर रहा है। अब आवश्यकता है तो भाषा के सरल मानकीकरण के काम को द्रुत गति देते हुए इसे आमजन तक पहुंचाया जाए। भाषा में परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। "भाषा के प्रति संवेदित समाज अगर इस परिवर्तन की निगहबानी करे और स्वयं इतना उदार और संवेदनशील हो कि परिवर्तन को परिवर्तन की तरह ले तो एक व्यावहारिक पुनर्मानकीकरण संभव हो सकता है।" 8. सही शब्दों, प्रयोगों के बारे में जागरूकता लाई जाए तब ही पत्रकारिता में भी हिंग्लिश का प्रयोग हतोत्साहित होगा और हिंग्लिश की चुनौती से हिन्दी विजय प्राप्त कर पाएगी। वस्तुतः पूरक प्रकृति के होने के कारण समाज की हिन्दी में सुधार से ही पत्रकारिता की हिन्दी की अशुद्धियां भी दूर होगी।

संदर्भ
1.भाषा का समाज शास्त्र, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, पृष्ठ-74
2.भाषा का समाज शास्त्र, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, पृष्ठ -75
3.पत्रकारिताःइतिहास और प्रश्न- कृष्ण बिहारी मिश्र, पृष्ठ-127
4.पत्रकारिताःइतिहास और प्रश्न- कृष्ण बिहारी मिश्र, पृष्ठ-128
5. वही
6. हिन्दी पत्रकारिता-जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि- कृष्ण बिहारी मिश्र, पृष्ठ-468.
7. ‘मीडिया, भाषा और संस्कृति’ लेखक कमलेश्वर
8. हिन्दीः कल आज और कल, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृष्ठ -166

Tuesday, March 24, 2015

बोल की लब आज़ाद हैं तेरे

आज़ादी क्या होती है? सही मायने में अभिव्यक्ति की आज़ादी ही सच्ची आज़ादी होती है। यानी जो सोचते हैं कि सही है उसे सही कह सकने का और जो आपकी नजर में गलत है उसे गलत कह पाने का अधिकार ही अभिव्यक्ति की आजादी है। सोश्यल मीडिया आम आदमी के लिए बदलते दौर में स्वयं की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बन कर उभरा है। यहां लोग खुल कर अपनी राय जाहिर कर रहे हैं, ऐसे में आज सुप्रीम कोर्ट का आई टी एक्ट की धारा 66ए को हटाने का आदेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की न केवल रक्षा करता है बल्कि इसे मजबूत भी करता है।  जाहिर है  यह स्वतंत्रता कर्तव्य की मांग करेगी और अभिव्यक्ति को स्वविवेक से जिम्मेदार होना होगा।    

Sunday, October 19, 2014

दोस्ताना पिच पर शाह-सेना की जीत

6 अक्टूबर के ब्लॉग में भाजपा-शिवसेना के बीच वोटों के ध्रवीकरण और बिखराव के दोस्ताना मैच के बारे में बताया गया था।




शाह आधुनिक चाणक्य तो मोदी चंद्रगुप्त मौर्य

लो जी महाराष्ट्र और हरियाणा में ईवीएम से जिन्न निकल आया। और यह जिन्न कोई अकस्मात नहीं निकला। इसके लिए ईवीएम को भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने बहुत करीने से अलग अलग अंदाज में कई तरीके से घिसा। तब ही तो महाराष्ट्र में भाजपा- शिवसेना की महायुति ने बहुत अच्छे तरीके से दोस्ताना लड़ाई लड़ते हुए अपने प्रतिद्वंद्वियों को चारों खाने चित्त कर दिया। दोनों ने 288 सदस्यों वाले सदन में 177 सीटों पर बढ़त बनाई है जो स्पष्ट बहुमत से कहीं आगे है। यह परिणाम तमाम राजनीतिक पंडितों के लिए भले ही चौंकाने वाले हों पर इस ब्लॉग में गत 6 अक्टूबर को ही यह स्पष्ट कर दिया था कि भाजपा और शिवसेना का गठबंधन टूटना एक सोची समझी रणनीति के तहत उठाया गया कदम है। वोटों के बिखराव और ध्रुवीकरण को ध्यान में रख कर यह बिसात बिछाई गई और वह बिसात पूरी तरह कामयाब साबित हुई। भाजपा ने 112 और शिवसेना 63 सीटों पर बढ़त बना रखी है। पूरे चुनाव अभियान के दौरान इसी वजह से भाजपा ने बाला साहेब ठाकरे के सम्मान के नाम पर शिवसेना के खिलाफ कोई बयानबाजी नहीं की। अमित शाह की रणनीति में शिवसेना अपने आपको ज्यादा सहज नहीं पा रही थी, क्योंकि उसे पहले से ही यह पता था कि उसका कद हर हाल में घटने जा रहा है, इसलिए सेना ने सामना के जरिए नरेंन्द्र मोदी पर जम कर जहर उगलने की कोशिश की और उनकी तुलना अफजल खान तक से कर दी। पर कहते हैं न कि अन्त भला तो सब भला। महाराष्ट्र में भाजपा-सेना का भगवा एक बार फिर से लहरा रहा है।
वहीं हरियाणा में भाजपा अकेले के दम पर सरकार बनाने जा रही है। कभी तीन लाल, देवीलाल-बंसीलाल-भजनलाल, की राजनीति का अखाड़ा रहे हरियाणा में कोई भी भाजपा को स्पष्ट बहुमत की ओर बढ़ता नहीं देख रहा था। वहां कि जातिवादी राजनीति के तार इस तरह से गुंथे हुए हैं कि पार्टी से ज्यादा खाप हावी रहती है इसलिए दशकों तक पहले तीनों लाल और फिर उनके उत्तराधिकारियों ने हरियाणा को अपनी बपौति की तरह बनाए रखा। वहां महज चार विधायकों के साथ बिना किसी चेहरे को आगे कर भाजपा ने जीत दर्ज की है तो इसमें भी सारी रणनीति अमित शाह की ही है। अमित शाह ने ही चुनाव से पहले ही चुन चुन कर नेताओं को भाजपा में शामिल किया। किसी को भी नेता घोषित नहीं किया। कुलदीप विश्नोई की पार्टी से चल रहे गठबंधन को बाहर का रास्ता दिखाया। अकालियों के जरिए आईएनएलडी को हवा दी ताकि वह कांग्रेस के वोट काटे और अंततः भाजपा प्रत्याशी विजयी वोट हासिल करे।
साफ है कि भाजपा ने यह चुनाव विचारधारा, एजेंडे से कहीं ज्यादा पूरी तरह से चुनावी वोट की कतर ब्यौंत के फार्मुले पर लड़ा और मोदी के चेहरे को आगे कर अमित शाह की रणनीति ने भाजपा को एक वटवृक्ष की सी स्थिति दी है। इस जीत का पूरे हकदार सही मायनों में यदि कोई है तो वह केवल और केवल अमित शाह हैं। वे भाजपा के चाणक्य और मोदी चंद्रगुप्त मौर्य हैं। अब साफ तौर पर अमित शाह का अगला अभियान जम्मू कश्मीर में भाजपा के मुख्यमंत्री की ताजपोशी करना होगा। पश्चिम बंगाल और दक्षिण में केरल-तमिलनाडु के अभेद्य गढ़ को भेदने जैसे दुष्कर काम का करना शाह का स्वप्न है।
पिछले पोस्ट में यह जिक्र था कि भाजपा में यह बहुत पहले ही तय हो चुका था कि नतीजे चाहे कुछ भी हों चुनाव के बाद सरकार भाजपा-शिवसेना की ही होगी। और भाजपा शिवसेना को राजनीतिक तोहफा दे कर सारे गिले शिकवे दूर कर देगी। तो भाजपा वह तोहफा देने की और कदम बढ़ा चुकी है और जल्द ही यह सामने आ जाएगा वह तोहफा क्या होगा।

Tuesday, October 7, 2014

बयानबाजियों से गर्म हो रहा महाराष्ट्र


 महाराष्ट्र का चुनाव दिन ब दिन दिलचस्प होता जा रहा है। गठबंधन के टूटने का दंश शिवसेना को कुछ ज्यादा ही साल रहा है या मामला कुछ और ही है। दरअसल चुनाव से बहुत पहले ही महाराष्ट्र की तस्वीर बहुत साफ हो गई थी। उस साफ तस्वीर ने ही शिवसेना- भाजपा को आमने सामने ला खड़ा किया और साफ तस्वीर धुंधली हो गई। वो साफ तस्वीर जो कह रही थी उसका संदेश था कि कांग्रेस एनसीपी की सरकार एंटी एन्कम्बैंसी और मोदी लहर के चलते दरवाजा देखेगी और प्रदेश में भाजपा-शिवसेना की सरकार बनेगी। अब शुरू होती है इस साफ तस्वीर के धुंधला जाने की कहानी। भाजपा और शिवसेना में पिछले सालों से जो गठबंधन चल रहा है उसमें एक शर्त साफ होती है, और वह यह कि जिसके भी ज्यादा सदस्य चुन कर आएंगे, उसी पार्टी का व्यक्ति मुख्यमंत्री या नेता प्रतिपक्ष होगा। यही फार्मुला निकाय चुनावों में भी चलता रहा है। तो इस बार जब सरकार साफ साफ आती नजर आ रही थी तब सबसे बड़ा सवाल जो मुंबई के मातोश्री और दिल्ली के 11, अशोक रोड में चक्कर काट रहा था वह था कि कौन बनेगा मुख्यमंत्री। बाला साहब ठाकरे के जमाने की शिवसेना में इस सवाल को कभी उठाया नहीं जाता था। जिसे बाला साहब चाहते वह मुख्यमंत्री हो जाता। लेकिन सत्ता की डोर अन्ततः बाला साहब के ही हाथ में रहती थी। यदि भाजपा का मुख्यमंत्री होता तब भी डोर अन्ततः बाला साहब के ही हाथ में रहती। पर बाला साहब के बाद के युग में हालात बदले हुए हैं। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना को अग्निपरीक्षा से गुजरना है। उद्धव का कद शिवसेना में तो निर्विवाद है पर भाजपा के नेता उनको बाला साहब की जगह नहीं देखते। ऐसे में शिवसेना किसी भी स्थिति में यह सुनिश्चित कर देना चाहती थी कि सरकार आने की स्थिति में उसी का मुख्यमंत्री हो। इसके लिए उसने बकायदा उद्घव ठाकरे का नाम भी चला दिया।  उद्घव ने भी कह दिया कि वक्त आने पर वे जिम्मेदारी से भागेंगे नहीं। यानी शिवसेना ने अपना दांव खेल दिया। पर भाजपा के सामने संकट की स्थिति बन गई।भाजपा के पास प्रदेश इकाई में उद्धव के कद का नेता नहीं है। जो हैं वो केन्द्र में कोई न कोई जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ऐसे में उद्धव के मुकाबले वो कोई चेहरे घोषित करने से बच रही थी।  परम्परा के अनुसार तो जिसके ज्यादा विधायक उसका मुख्यमंत्री होता, पर उद्धव के घोषणा करने से ऐसा संदेश जाने लगा था कि भाजपा ने भी उद्धव को गठबंधन का मुख्यमंत्री स्वीकार कर लिया है। और चुनाव के बाद संख्या बल की बात करना महज एक औपचारिकता भर रह जाता। महाराष्ट्र में वैसे भी शिवसेना भाजपा की तुलना में कहीं अधिक सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। ऐसे में संभवतया उसके विधायक ज्यादा हो सकते थे, पर भाजपा का सफलता का प्रतिशत ज्यादा था, और भाजपा पहले भी सेना की तुलना में ज्यादा विधायक जितवा कर ला चुकी है। मुख्यमंत्री पद की दौड़ को खुला रखने के लिए भाजपा ने ज्यादा सीटों पर लड़ने की मांग की। जाहिर है इससे शिवसेना की सीटों में कमी आती और अन्ततः इसका असर चुनाव के बाद शिवसेना के विधायकों की संख्या पर दिखाई देता। ज्यादा विधायकों की स्थिति में भाजपा स्वाभाविक तौर पर मुख्यमंत्री पद का दावा करती और उद्धव का दावा कमजोर पड़ जाता। मुख्यमंत्री पद को लेकर जब संकट ज्यादा गहराना भाजपा के रणनीतिकारों को  अपने लिए मुफीद ही लगा। उनकी गणित में वोटों का बिखराव ही भाजपा के लिए फायदेमंद होना था। तो इसी रणनीति पर चल रही भाजपा गठबंधन के टूटने में एक तीर से दो निशाने साधते दिख रही है। वोटों का बिखराव न केवल उसकी संभावनाओं को बढ़ाता है बल्कि चुनाव के बाद उसकी अपनी सरकार की स्थिति भी बनती है। शिवसेना को यह स्थिति पूरी तरह नागवार गुजर रही है और इसीलिए दिनोंदिन उसके तेवर तीखे होते जा रहे हैं। शिवसेना के निशाने पर अब एनसीपी कांग्रेस की जगह भाजपा है। ज्यों ज्यों चुनावी चौसर बिछ रही प्रचार में जुटे भाजपा नेता खासे उत्साहित होते जा रहे हैं। एक उत्साहित भाजपा नेता की अपनी गणित के मुताबिक पार्टी वहां 140 सीटों को जीतने की स्थिति में पहुंच चुकी है। यदि ऐसा होता है तो शिवसेना के लिए यह एक तरह का झटका ही होगा। हालांकि उन्हीं भाजपा नेता का यह भी कहना है कि महाराष्ट्र की सरकार शिवसेना और भाजपा मिल कर ही चलाएंगे। हो सकता है चुनाव के बाद भाजपा शिवसेना को ऐसा बड़ा तोहफा भी दे दे जिसकी राजनीतिक पंडितों तक ने उम्मीद नहीं की हो।